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Monday, March 30, 2015

Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha(look into the matter by gathering knowledge) =Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Howrah, West Bengal. Thus there is no fundamental difference in the Banerjee and Jha.------------The Kedareshwar is the Aadishankar (1st existing form of the Mahadev on the earth at Kashi) thus he is the senior most of all possible his own form (of Shiv/Mahadev) in this world.



Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha(look into the matter by gathering knowledge) =Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Howrah, West Bengal. Thus there is no fundamental difference in the Banerjee and Jha.------------The Kedareshwar is the Aadishankar (1st existing form of the Mahadev on the earth at Kashi) thus he is the senior most of all possible his own form (of Shiv/Mahadev) in this world.

RAMA is the name of Sita followed by RAM means Ram's one i.e. here Sita known by name of RAM and SITAPATI is the name of Ram followed by SIta means Sita's one. If there had happened any unwanted event in the world with RAMA/Jagad-Amba/Jagat-Janani and its people then Lav/Hindu-Kush will do struggle first. That had happened before 14 year ago.

RAMA is the name of Sita followed by RAM means Ram's one i.e. here Sita known by name of RAM and SITAPATI is the name of Ram followed by SIta means Sita's one. If there had happened any unwanted event in the world with RAMA/Jagad-Amba/Jagat-Janani and its people then Lav/Hindu-Kush will do struggle first. That had happened before 14 year ago.


https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur

सुवैचारिक और चरित्रवान व्यक्तियों के संघ में आने से शक्ति संवर्धन होता है न की शुक्राचार्य और उनसे प्रभावित राक्षशीमत वालों के संघ में शक्ति संवर्धन होता है; वरन यह संघ तो नाशवान होगा प्रवृत्ति में और पूरे संघ परिवार को मुंह की खानी पद सकती है हर मोर्चे पर केवल अपने-अपने अधिकार की लड़ाई में जिस शक्तिपुंज को संघ प्रत्येक स्वयंसेवक की सेवाशक्ति से प्राप्त किये रहता है।--------यह किशी वर्तमान संस्था विशेष पर टिप्पणी नहीं अपितु संथागत आम विचार और व्यवहार प्रस्तुत करता है।



सुवैचारिक और चरित्रवान व्यक्तियों के संघ में आने से शक्ति संवर्धन होता है न की शुक्राचार्य और उनसे प्रभावित राक्षशीमत वालों के संघ में शक्ति संवर्धन होता है; वरन यह संघ तो नाशवान होगा प्रवृत्ति में और पूरे संघ परिवार को मुंह की खानी पद सकती है हर मोर्चे पर केवल अपने-अपने अधिकार की लड़ाई में जिस शक्तिपुंज को संघ प्रत्येक स्वयंसेवक की सेवाशक्ति से प्राप्त किये रहता है।--------यह किशी वर्तमान संस्था विशेष पर टिप्पणी नहीं अपितु संथागत आम विचार और व्यवहार प्रस्तुत करता है।

जिनके बेटे/बेटियां हिन्दू/भारतीय संस्कृति के अनुसार मर्यादित आचरण यदि नहीं कर रहे/रहीं तो यदि उन माता-पिता को भारतीय उच्च राजनैतिक पदों पर नहीं होना चाहिए या उनका राजनैतिक पद छोटा हो जाना चाहिए तो मेरे अनुसार यही समय है की यह नियम तो राजनयिक/ प्रशानिक अधिकारी/शिक्षाधिकारी/व् अन्य सार्वजनिक राशि से जनित सेवा के पदों व् ग्राम जैसी छोटी पंचायती व्यवस्था तक के लिए भी सख्ती प्रयोग जाना चाहिए। जो अपने परिवार को नियंत्रित नहीं कर सकता वह आम जनता को क्या नियंत्रीय करेगा अगर आप का यही उच्च वैचारिक आधार है तो मै उसका समर्थक बन सकता हूँ अगर पूर्ण पालन हो सर्वत्र इसका?

जिनके बेटे/बेटियां हिन्दू/भारतीय संस्कृति के अनुसार मर्यादित आचरण यदि नहीं कर रहे/रहीं तो यदि उन माता-पिता को भारतीय उच्च राजनैतिक पदों पर नहीं होना चाहिए या उनका राजनैतिक पद छोटा हो जाना चाहिए तो मेरे अनुसार यही समय है की यह नियम तो राजनयिक/ प्रशानिक अधिकारी/शिक्षाधिकारी/व् अन्य सार्वजनिक राशि से जनित सेवा के पदों व् ग्राम जैसी छोटी पंचायती व्यवस्था तक के लिए भी सख्ती प्रयोग जाना चाहिए। जो अपने परिवार को नियंत्रित नहीं कर सकता वह आम जनता को क्या नियंत्रीय करेगा अगर आप का यही उच्च वैचारिक आधार है तो मै उसका समर्थक बन सकता हूँ अगर पूर्ण पालन हो सर्वत्र इसका 

कुछ लोगों का भ्रम मै दूर कर देता हूँ की ग्वाला केवल चंद्रवंशी ही नहीं सूर्यवंशी भी हुए हैं: भगवान श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप जब कामधेनु को बिना प्रणाम किये अज्ञानतावश जब अपना रथ कामधेनु के सामने से लेकर गुजर गए तो इससे कामधेनु ने जो अपमान महसूस किया उसके परिणाम स्वरुप राजा दिलीप का को पुत्र/संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी तो ऐसे में राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ आदेशानुसार कामधेनु की तपस्या बहुत दिनों तक किये तो काम धेनु न उनको अपनी पुत्री नंदिनी की रक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी दी थी। इस प्रकार राजा दिलीप बहुत दिनों तक एक ग्वाले के रूप में जीवन वितायें और अंत में स्वयं कामधेनु ने सिंह का रूप धारण कर नंदिनी को खाना चाहा परिक्षा स्वरुप तो राजा दिलीप उसके बदले अपने को उस सिंघरूपी गौमाता कामधेनु के सामने रखदिया और इस प्रकार उनका ग्वालों का जीवन पूर्ण हुआ और सन्तानोत्त्पत्ति का आशीर्वाद गौमाता कामधेनु से मिला। इस प्रकार गौतम ऋषि के बाद जब मानव जन्म में गौ सेवा की बात आती है तो राजा दिलीप और स्वयं द्वारिकाधीस श्रीकृष्ण की बात आती है जिसमे श्रीकृष्ण वृष्णि/यदु/चन्द्र वंशीय और राजा दिलीप सूर्यवंशीय थे। तो कोई अपने को गवाल कहता है तो उसका चन्द्रवंशीय होना अनिवार्य नहीं वह सूर्यवंशीय या अन्य वंश का भी हो सकता है। वैसे भी प्राचीनकाल में तो गोचारण और हल चलना ही आम आदमी के जीवन का जीविका स्रोत रहा है।



कुछ लोगों का भ्रम मै दूर कर देता हूँ की ग्वाला केवल चंद्रवंशी ही नहीं सूर्यवंशी भी हुए हैं: भगवान श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप जब कामधेनु को बिना प्रणाम किये अज्ञानतावश जब अपना रथ कामधेनु के सामने से लेकर गुजर गए तो इससे कामधेनु ने जो अपमान महसूस किया उसके परिणाम स्वरुप राजा दिलीप का को पुत्र/संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी तो ऐसे में राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ आदेशानुसार कामधेनु की तपस्या बहुत दिनों तक किये तो काम धेनु न उनको अपनी पुत्री नंदिनी की रक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी दी थी। इस प्रकार राजा दिलीप बहुत दिनों तक एक ग्वाले के रूप में जीवन वितायें और अंत में स्वयं कामधेनु ने सिंह का रूप धारण कर नंदिनी को खाना चाहा परिक्षा स्वरुप तो राजा दिलीप उसके बदले अपने को उस सिंघरूपी गौमाता कामधेनु के सामने रखदिया और इस प्रकार उनका ग्वालों का जीवन पूर्ण हुआ और सन्तानोत्त्पत्ति का आशीर्वाद गौमाता कामधेनु से मिला। इस प्रकार गौतम ऋषि के बाद जब मानव जन्म में गौ सेवा की बात आती है तो राजा दिलीप और स्वयं द्वारिकाधीस श्रीकृष्ण की बात आती है जिसमे श्रीकृष्ण वृष्णि/यदु/चन्द्र वंशीय और राजा दिलीप सूर्यवंशीय थे। तो कोई अपने को गवाल कहता है तो उसका चन्द्रवंशीय होना अनिवार्य नहीं वह सूर्यवंशीय या अन्य वंश का भी हो सकता है। वैसे भी प्राचीनकाल में तो गोचारण और हल चलना ही आम आदमी के जीवन का जीविका स्रोत रहा है।

Sunday, March 29, 2015

प्रमदाचरण(ही शुद्ध है जबकि प्रमदा चरण अम्भ्रंश है) का शाब्दिक अर्थ है सुन्दर आचरण वाला तो मित्रों अभी तक इस मानवीय संसार में सबसे सुन्दर आचरण किसका रहा है? उत्तर आता है की श्रीराम का और उसके बाद श्रीकृष्ण का। प्रमदाचरण बनर्जी और केदारेश्वर(आदिशंकर/शिव)[केदारेश्वर/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ)] बनर्जी से मेरा क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न के उत्तर में जैसा की क्रमसः ऐसे नामित छात्रावास का अधीक्षक और शिक्षक हूँ। दूसरा यह की मै बचपन से दो ही मिनट सही बनर्जी[बुद्धिमतां-वरिष्ठं((सेवक(राम भक्त)+ब्राह्मण(जनेऊ छाजे)+क्षत्रिय(अहिरावण की भुजा ऊपरी)+वैश्य (भक्तों के लिए दाता))] /हनुमान/शंकरसुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनपुत्र/केशरीनन्दन/अंजनिपुत्र; भगवान श्रीराम; सरस्वती माँ; और गायत्री माँ की पूजा और नाम जाप नहाने के बाद जरूर करता था यह भी एक सम्बन्ध हो सकता है।Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha= Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Bengal]


प्रमदाचरण(ही शुद्ध है जबकि प्रमदा चरण अम्भ्रंश है) का शाब्दिक अर्थ है सुन्दर आचरण वाला तो मित्रों अभी तक इस मानवीय संसार में सबसे सुन्दर आचरण किसका रहा है? उत्तर आता है की श्रीराम का और उसके बाद श्रीकृष्ण का। प्रमदाचरण बनर्जी और केदारेश्वर(आदिशंकर/शिव)[केदारेश्वर/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ)] बनर्जी से मेरा क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न के उत्तर में जैसा की क्रमसः ऐसे नामित छात्रावास का अधीक्षक और शिक्षक हूँ। दूसरा यह की मै बचपन से दो ही मिनट सही बनर्जी[बुद्धिमतां-वरिष्ठं((सेवक(राम भक्त)+ब्राह्मण(जनेऊ छाजे)+क्षत्रिय(अहिरावण की भुजा ऊपरी)+वैश्य (भक्तों के लिए दाता))] /हनुमान/शंकरसुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनपुत्र/केशरीनन्दन/अंजनिपुत्र; भगवान श्रीराम; सरस्वती माँ; और गायत्री माँ की पूजा और नाम जाप नहाने के बाद जरूर करता था यह भी एक सम्बन्ध हो सकता है।Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha= Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Bengal]

मुझे जानने वालों में कौतुहल आज भी है की मेरा नाम विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक/माँ सरस्वती का ज्येष्ठ पुत्र(शिव और शिवा दोनों का रक्षा कवच) जो सदा माडर्न(आधुनिक) है उसके बावजूद मै अपने बड़े पुत्र का नाम विष्णुकान्त/वेंकटेश(राशिनाम) और छोटे पुत्र का नाम कृष्णकांत/वाशुदेव(राशिनाम) क्यों रखा वह भी केवल अपने मन से जबकि आप परिवार वालों की सहमति के बिना कुछ नहीं करते हैं: तो मै पुनः दोहराता हूँ की सुबह 5. 11 पर 30-09-2010 को शुक्लपक्ष में कमलानेहरु मार्ग (चंद्रशेखर आजाद पार्क के सामने) नाजरेथ हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम मै मै रामजी (सशरीर परमब्रह्म) रखना चाहता था क्योंकि दोपहर को उसके जन्म के बाद एक तो श्रीराम मंदिर का स्पस्ट परन्तु लोकानुसार बाधित पक्ष रामलला अपना अधिकार पाये दूसरा की मै जिस विश्वव्यापक परिवर्तन के समुद्रमंथन में लगा था उसमे प्रेमचंद(विश्व), विष्णु(श्रीधर) और ब्रह्मा (जोशी) शक्ति मुझमे समाहित थी जिससे दृस्तिगोचर शक्ति विष्णु(श्रीधर) की ही मेरे साथ थी इसी से उनके नाम से जाने जाने वाले परमब्रह्म के पर्याय का नाम ध्यान में रखते हुए उसका नाम विष्णुकांत(विष्णु का स्वामी/प्रेमी =परमब्रह्म जिससे की ब्रह्मा विष्णु और महेश की उत्पत्ति स्वयं होती है) रखा। दूसरे पुत्र का जन्म ही हजारों वर्ष केवल एक बार श्रीकृष्ण जन्म तिथि और गृह नक्षत्र एक साथ प्रकट होने वाले श्रीकृष्ण जन्मास्टमी पर्व पर शाम 8 . 12 बजे, 28--08-2013 को कृष्णपक्ष में, बाघम्बरी हाऊसिंग क्षेत्र, अल्लाह्पुर के साकेत हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम कृष्णकांत रखा जो मेरे गिरिधारी राशिनाम का पूरक है। तो इस प्रकार विष्णुकांत मेरी जिम्मेदारियों के प्रतीक है इस प्रकार जिन शक्तियों का मै प्रतिनिधि था वे विश्वव्यापी संतुलित शक्तियों उसमे संरक्षित है और कृष्णकांत मेरे प्रतीक हैं लेकिन मै विवेक(गिरिधारी) तो श्रीराम में रमा हूँ बचपन से तो देखना है कृष्णकांत) कैसे होते हैं?

मुझे जानने वालों में कौतुहल आज भी है की मेरा नाम विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक/माँ सरस्वती का ज्येष्ठ पुत्र(शिव और शिवा दोनों का रक्षा कवच) जो सदा माडर्न(आधुनिक) है उसके बावजूद मै अपने बड़े पुत्र का नाम विष्णुकान्त/वेंकटेश(राशिनाम) और छोटे पुत्र का नाम कृष्णकांत/वाशुदेव(राशिनाम) क्यों रखा वह भी केवल अपने मन से जबकि आप परिवार वालों की सहमति के बिना कुछ नहीं करते हैं: तो मै पुनः दोहराता हूँ की सुबह 5. 11 पर 30-09-2010 को शुक्लपक्ष में कमलानेहरु मार्ग (चंद्रशेखर आजाद पार्क के सामने) नाजरेथ हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम मै मै रामजी (सशरीर परमब्रह्म) रखना चाहता था क्योंकि दोपहर को उसके जन्म के बाद एक तो श्रीराम मंदिर का स्पस्ट परन्तु लोकानुसार बाधित पक्ष रामलला अपना अधिकार पाये दूसरा की मै जिस विश्वव्यापक परिवर्तन के समुद्रमंथन में लगा था उसमे प्रेमचंद(विश्व), विष्णु(श्रीधर) और ब्रह्मा (जोशी) शक्ति मुझमे समाहित थी जिससे दृस्तिगोचर शक्ति विष्णु(श्रीधर) की ही मेरे साथ थी इसी से उनके नाम से जाने जाने वाले परमब्रह्म के पर्याय का नाम ध्यान में रखते हुए उसका नाम विष्णुकांत(विष्णु का स्वामी/प्रेमी =परमब्रह्म जिससे की ब्रह्मा विष्णु और महेश की उत्पत्ति स्वयं होती है) रखा। दूसरे पुत्र का जन्म ही हजारों वर्ष केवल एक बार श्रीकृष्ण जन्म तिथि और गृह नक्षत्र एक साथ प्रकट होने वाले श्रीकृष्ण जन्मास्टमी पर्व पर शाम 8 . 12 बजे, 28--08-2013 को कृष्णपक्ष में, बाघम्बरी हाऊसिंग क्षेत्र, अल्लाह्पुर के साकेत हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम कृष्णकांत रखा जो मेरे गिरिधारी राशिनाम का पूरक है। तो इस प्रकार विष्णुकांत मेरी जिम्मेदारियों के प्रतीक है इस प्रकार जिन शक्तियों का मै प्रतिनिधि था वे विश्वव्यापी संतुलित शक्तियों उसमे संरक्षित है और कृष्णकांत मेरे प्रतीक हैं लेकिन मै विवेक(गिरिधारी) तो श्रीराम में रमा हूँ बचपन से तो देखना है कृष्णकांत) कैसे होते हैं?