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Wednesday, August 26, 2015

वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों। केवल तथाकथित अन्य पिछड़े वर्ग ही नहीं तथाकथित दलित और अनुसूचित जनजातियों समेत अन्य जाति धर्म को भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जैसे समान सामाजिक स्तर के मुख्य अवयव से ही या इनका ही व्युत्पन्न या उनका ही सीधा स्वरुप सिद्ध कर सकता हूँ पर सामाजिक व्यवस्था में भूचाल आने से सामाजिक व्यवस्था को चलाने में बाधा आएगी राजसत्ता में बैठे बड़े और छोटे भाइयों और बहनो को। अतः मेरा प्रयास रहेगा की उनकी क्षमता अनुकूल खुलासा धीरे धीरे अपने आप हो जैसे मई 14 वर्ष पूर्व अचानक यह जान कर भी धीरे-धीरे सब प्रस्तुत कर रहा हूँ। वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों। मै अपने गाँव और ननिहाल में ही भारत और विश्व दर्शन करके ही और अपने सभी गुरुकुल का दर्शन करके ही सब कुछ सामाजिक दर्शन दे रहा हूँ मुझे कही बाहर से उदाहरण नहीं लेना है। आप जिसका भी चाहेंगे और जो चाहेंगे सबका आचरण संज्ञान में आएगा मेरे द्वारा आप के सम्मुख ।

वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और  विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों।  केवल तथाकथित अन्य पिछड़े वर्ग ही नहीं तथाकथित दलित और अनुसूचित जनजातियों समेत अन्य जाति धर्म को भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जैसे समान सामाजिक स्तर के मुख्य अवयव से ही या इनका ही व्युत्पन्न या उनका ही सीधा स्वरुप सिद्ध कर सकता हूँ पर सामाजिक व्यवस्था में भूचाल आने से सामाजिक व्यवस्था को चलाने में बाधा आएगी राजसत्ता में बैठे बड़े और छोटे भाइयों और बहनो को। अतः मेरा प्रयास रहेगा की उनकी क्षमता अनुकूल खुलासा धीरे धीरे अपने आप हो जैसे मई 14 वर्ष पूर्व अचानक यह जान कर भी धीरे-धीरे सब प्रस्तुत कर रहा हूँ। वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और  विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों।  मै अपने गाँव और ननिहाल में ही भारत और विश्व दर्शन करके ही और अपने सभी गुरुकुल का दर्शन करके ही  सब कुछ सामाजिक दर्शन दे रहा हूँ मुझे कही बाहर से उदाहरण नहीं लेना है। आप जिसका भी चाहेंगे और  जो चाहेंगे सबका आचरण संज्ञान में आएगा मेरे द्वारा आप के सम्मुख । 

शिकायत आंगिरस गोत्रीय सनातन ब्राह्मण जोशी (ब्रह्मा)जी से की आप की सम्पूर्ण संप्रभुता और अधिकार जिन लोगों के पास रहा वे वैयक्तिक विकास को प्रमुखता देते रहे वही आप के कार्य का विरोध भी आतंरिक रूप से अज्ञानता वस दूसरों के दबाव/(वे अन्य शक्तियों को ज्यादा शक्तिशाली समझने लगे जो मुझसे कहीं अत्यंत कमजोर इक्षाशक्ति और मुझसे ही साम दाम दंड भेद का भाव रखती थीं) में करते रहे और इस प्रकार मेरा विरोध कर रहे थे सहमात का खेल खेलते हुए इसके साथ ही साथ आप को ही सर्वोच्च शक्ति समझते हुए मुझे उतने ही पर संतुस्ट रहना सिखाते रहे जितने से मई किशी तरह जी सकूँ पर मई इसे अन्य दो शक्तियों के कार्यपालन और आप के कार्यपूर्ती हेतु सहता रहा। मै केवल इतना समझता था की मुझे अन्य दोनों शक्तियों(विष्णु/गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे मामा श्रीश्रीधर मिश्र जी और शिव/कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे ताउजी डॉ प्रेम चंद पाण्डेय) द्वारा आप के कार्यपूर्ती हेतु भेजा गया है तो किशी भी कीमत पर आप का कार्यपूर्ती मेरा ध्धेय रहा और वह पूर्ण होकर ही रहा इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज और वैश्विक रूप से भी। एक ऐसा समय आया था मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु जैसे भारतीय सर्वोच्च शिक्षण संस्थान में रहने के दौरान मेरी दृस्टि से सब कुछ अनर्थ देख मेरी सहनशीलता जबाब दे गयी और मुझे ऑरकुट पर कहना पड़ा की डान(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई जय श्रीराम करो सभी ऐसे शिक्षण और शोध संस्थानों का और मै गाँव जाकर एक जोड़ी बैल खरीदकर हल जोतूंगा और इस प्रकार खेती करूंगा पर यह सब बर्दास्त नहीं करूंगा भारत भूमि पर या इन सबको जो इस तरह से जीना चाह रहे हैं उनको विश्व में सामूहिक समझौते के तहत स्थान विशेष पर इस विश्व के किशी स्थान पर केंद्रित करो जहां पर ये शोध करते हुए जो चाहे सो करें अगर इनको भारतीय संस्कृति के आधार पर नहीं रहना है या भारतीय संस्कृति के आधार पर आचरण नहीं करना है । टिप्पणी: मेरे गाँव में मेरे खानदान में खेत में किशी सदस्य द्वारा जुताई का काम अपने खेत पर वर्जित है जबकि अन्य खेती के हर बड़े से छोटे कार्य नहीं वर्जित है और इन सबके बावजूद मैंने खुद बैल खरीदकर गाँव की खेती में ही हल जोतना स्वीकार किया पर जो हो रहा था उसे बर्दास्त नहीं कर सकता था।

शिकायत आंगिरस गोत्रीय सनातन ब्राह्मण जोशी (ब्रह्मा)जी से की आप की सम्पूर्ण संप्रभुता और अधिकार जिन लोगों के पास रहा वे वैयक्तिक विकास को प्रमुखता देते रहे वही आप के कार्य का विरोध भी आतंरिक रूप से अज्ञानता वस दूसरों के दबाव/(वे अन्य शक्तियों को ज्यादा शक्तिशाली समझने लगे जो मुझसे कहीं अत्यंत कमजोर इक्षाशक्ति और मुझसे ही साम दाम दंड भेद का भाव रखती थीं)  में करते रहे और इस प्रकार मेरा विरोध कर रहे थे सहमात का खेल खेलते हुए इसके साथ ही साथ आप को ही सर्वोच्च शक्ति समझते हुए मुझे उतने ही पर संतुस्ट रहना सिखाते रहे जितने से मई किशी तरह जी सकूँ पर मई इसे अन्य दो शक्तियों के कार्यपालन और आप के कार्यपूर्ती हेतु सहता रहा। मै केवल इतना समझता था की मुझे अन्य दोनों शक्तियों(विष्णु/गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे मामा श्रीश्रीधर मिश्र जी और शिव/कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे ताउजी डॉ प्रेम चंद पाण्डेय) द्वारा आप के कार्यपूर्ती हेतु भेजा गया है तो किशी भी कीमत पर आप का कार्यपूर्ती मेरा ध्धेय रहा और वह पूर्ण होकर ही रहा इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज और वैश्विक रूप से भी। एक ऐसा समय आया था मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु जैसे भारतीय सर्वोच्च शिक्षण संस्थान में रहने के दौरान मेरी दृस्टि से सब कुछ अनर्थ देख मेरी सहनशीलता जबाब दे गयी और मुझे ऑरकुट पर कहना पड़ा की डान(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई जय श्रीराम करो सभी ऐसे शिक्षण और शोध संस्थानों का और मै गाँव जाकर एक जोड़ी बैल खरीदकर हल जोतूंगा और इस प्रकार खेती करूंगा पर यह सब बर्दास्त नहीं करूंगा भारत भूमि पर या इन सबको जो इस तरह से जीना चाह रहे हैं उनको विश्व में सामूहिक समझौते के तहत स्थान विशेष पर इस विश्व के किशी स्थान पर केंद्रित करो जहां पर ये शोध करते हुए जो चाहे सो करें अगर इनको भारतीय संस्कृति के आधार पर नहीं रहना है या भारतीय संस्कृति के आधार पर आचरण नहीं करना है ।  टिप्पणी: मेरे गाँव में मेरे खानदान में खेत में किशी सदस्य द्वारा जुताई का काम अपने खेत पर वर्जित है जबकि अन्य खेती के हर बड़े से छोटे कार्य नहीं वर्जित है और इन सबके बावजूद मैंने खुद बैल खरीदकर गाँव की खेती में ही हल जोतना स्वीकार किया पर जो हो रहा था उसे बर्दास्त नहीं कर सकता था। 

Tuesday, August 25, 2015

अंततः विवेक(त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महादेव की आंतरिक सुरक्षा शक्ति जो उनको शक्ति का मुख्य स्रोत बनाता है या जिसे आप शिव शक्ति या शिवशक्ति का केंद्र कह सकते हैं): ------- जिसकी/रामापुर-223225, आजमगढ़ की कुलदेवी देवकाली(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी)=दुर्गा और जिसके/ मेरे ननिहाल/बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र/परशुरामपिता)पुर के मुख्य आराध्य स्वयं महादेव रहे हो तो यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला/विल्वा पत्र/बेलपत्र( जो शिव की शक्ति और शिव पर सपमर्पित होने वाला तथा शिवा/पार्वती का आहार है) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक कुमार पाण्डेय स्वयं ब्रह्मा(जोशी) के जगति कल्याणहेतु कार्य में स्वयं विष्णु(श्रीधर/मेरे स्वयं के मामा और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर) और स्वयं शिव(प्रेमचंद/चन्द्रमा प्रेमी/मेरे ताऊ जी और परमपिता परमेश्वर) के आदेशनुसार अगर मै अपने अस्तित्व को समाप्त प्राय कर लेने पर(वैसे में इस मानवता के हित में विषपान भी पसंद किया हूँ पर इसमें अपनी दो पीढ़ी की ऊर्जा, अपने आजीवन सद्कर्मों के बदले मान, सम्मान और अभिमान जो था और अपना 25 वर्ष की उम्र का भविष्य भी इसी दुनिया की चकाचौंध और अस्तित्व बनाये रखने हेतु गुरुदेवों के आदेशानुसार अपना ही अस्तित्व समाप्त प्राय कर दिया था) ऐसे कार्य की पूणर्रूपेण कार्यपूर्ती हो जाने पर भी अगर अस्तित्व में रह गया तो आप मुझ विवेक का आंकलन किस रूप में कर रहे हैं यह आप के ही विवेक पर निर्भर करता है? फिर भी बता दूँ की कही आप आत्मघाती कदम तो नही उठा रहे यह भी आपको अपने विवेक से ही सोचना है।

अंततः विवेक(त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महादेव की आंतरिक सुरक्षा शक्ति जो उनको शक्ति का मुख्य स्रोत बनाता है या जिसे आप शिव शक्ति या शिवशक्ति का केंद्र कह सकते हैं): ------- जिसकी/रामापुर-223225, आजमगढ़ की कुलदेवी देवकाली(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी)=दुर्गा और जिसके/ मेरे ननिहाल/बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र/परशुरामपिता)पुर के मुख्य आराध्य स्वयं महादेव रहे हो तो यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला/विल्वा पत्र/बेलपत्र( जो शिव की शक्ति और शिव पर सपमर्पित होने वाला तथा शिवा/पार्वती का आहार है) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक कुमार पाण्डेय स्वयं ब्रह्मा(जोशी) के जगति कल्याणहेतु कार्य में स्वयं विष्णु(श्रीधर/मेरे स्वयं के मामा और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर) और स्वयं शिव(प्रेमचंद/चन्द्रमा प्रेमी/मेरे ताऊ जी और परमपिता परमेश्वर) के आदेशनुसार अगर मै अपने अस्तित्व को समाप्त प्राय कर लेने पर(वैसे में इस मानवता के हित में विषपान भी पसंद किया हूँ पर इसमें अपनी दो पीढ़ी की ऊर्जा, अपने आजीवन सद्कर्मों के बदले मान, सम्मान और अभिमान जो था और अपना 25 वर्ष की उम्र का भविष्य भी इसी दुनिया की चकाचौंध और अस्तित्व बनाये रखने हेतु गुरुदेवों के आदेशानुसार अपना ही अस्तित्व समाप्त प्राय कर दिया था) ऐसे कार्य की पूणर्रूपेण कार्यपूर्ती हो जाने पर भी अगर अस्तित्व में रह गया तो आप मुझ विवेक का आंकलन किस रूप में कर रहे हैं यह आप के ही विवेक पर निर्भर करता है? फिर भी बता दूँ की कही आप आत्मघाती कदम तो नही उठा रहे यह भी आपको अपने विवेक से ही सोचना है। 

जो दुर्गा(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी) हेतु या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्य हेतु मारा गया या जो श्रीराम/कृष्ण (सशरीर परमब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्यहेतु मरा गया वह दुर्गा और श्रीराम में सीधे ही मिल गया तो इससे अच्छा परमपद और क्या हो सकता है जिसे महामानव से लेकर दानव(रावण जैसा महापंडित भी इसी श्रेणी में शामिल है) तक पाना चाहते है।

जो दुर्गा(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी) हेतु या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्य हेतु मारा  गया या जो श्रीराम/कृष्ण (सशरीर परमब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्यहेतु मरा गया वह दुर्गा और श्रीराम में सीधे ही मिल गया तो इससे अच्छा परमपद और क्या हो सकता है जिसे महामानव से लेकर दानव(रावण जैसा महापंडित भी इसी श्रेणी में शामिल है) तक पाना चाहते है।  

  

मानव अपनी सभ्यता, संस्कृति छोड़ने पर और विकराल प्रलय की स्थिति उपरांत अज्ञानता की स्थिति में पहुँचने के बाद आदिमानव होता रहता है न की आदिमानव से मानव तक का विकाश हुआ। जिसने अपनी संस्कृति और संस्कार छोड़ दिए वह आदिमानव नहीं पशु और राक्षस से भी बदतर हो जाता है और न मानते हों तो दिल्ली में दिसंबर में अभी कुछ वर्ष पूर्व में ही हुई "निर्भया" घटना इसका सबसे ज्वलंत उदहारण है। कोई वैज्ञानिक किशी अमीबा को एक पूर्ण संस्कारित मानव बना कर दिखाए अगर मानव और अन्य जीव जंतुओं को उनका अपने ही रूप में सीधे-शीधे स्वाभिक उत्पति इस्वर प्रदत्त नहीं मानता है।

मानव अपनी सभ्यता, संस्कृति छोड़ने पर और विकराल प्रलय की स्थिति उपरांत अज्ञानता की स्थिति में पहुँचने के बाद आदिमानव होता रहता है न की आदिमानव से मानव तक का विकाश हुआ। जिसने अपनी संस्कृति और संस्कार छोड़ दिए वह आदिमानव नहीं पशु और राक्षस से भी बदतर हो जाता है और न मानते हों तो दिल्ली में दिसंबर में अभी कुछ वर्ष पूर्व में ही हुई "निर्भया" घटना इसका सबसे ज्वलंत उदहारण है। कोई वैज्ञानिक किशी अमीबा को एक पूर्ण संस्कारित मानव बना कर दिखाए अगर मानव और अन्य जीव जंतुओं को उनका अपने ही रूप में सीधे-शीधे स्वाभिक उत्पति इस्वर प्रदत्त नहीं मानता है। 

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:

१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|

२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।

3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।

4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.

5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

अगर विधि के आचार्य को भारतीय संसद द्वारा पूर्ण रूपेण स्थापित विधि के स्पष्ट परिभाषित नियमों के विपरीत आचरण और आदेश करने का हक़ जो संसार दिया है तो वहीं संसार जिसके कारन जन्म और बारम्बार जिसकी सहनशीलता पर अनेकों बार पुनर्जन्म पाया हो तो उसके द्वारा नस्ट ही कर दिया जाय उसके द्वारा तो इसमें क्या गलत है?

अगर विधि के आचार्य को भारतीय संसद द्वारा पूर्ण रूपेण स्थापित विधि के स्पष्ट परिभाषित नियमों के विपरीत आचरण और आदेश करने का हक़ जो संसार दिया है तो वहीं संसार जिसके कारन जन्म और बारम्बार जिसकी सहनशीलता पर अनेकों बार पुनर्जन्म पाया हो तो उसके द्वारा नस्ट ही कर दिया जाय उसके द्वारा तो इसमें क्या गलत है?