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Saturday, April 18, 2015

वरिष्ठता बस्ती जनपद से आये सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/रामप्रसाद/रामअवध/गजाधर/आदिशंकर/सतीश/सुभाष/अभयचंद (रामापुर-223225, आजम(महान)गढ़/आर्यमगढ़/महान लोगों का स्थान) की रही और श्रेष्ठता गोरखपुर जनपद से आये सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण बाबा निवाजी/रामानंद/रामानुज(लक्षमण)/श्रीनिवाश(विष्णु)/रामप्रशाद/रमानाथ(बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्निपुर) की रही एक ब्राह्मण के रूप में तो मई क्या कहता? मुझे मान्य है की दुनिया को चमत्कारिक बनाने के लिए कुछ नियम टूटते है पर इसका मतलब यह नहीं की पूर्ण निर्धारित नियम तोड़ दें और ऐसा हुआ था और अगर ऐसा हुआ था तो "सत्यमेव जयते"/"सुदर्शन चक्र" ने अपना काम किया अशोकचक्र/शिव के कालचक्र/समय चक्र/24 ऋषियों के धर्मचक्र के स्थान पर और इस प्रकार विश्व व्यापक परिवर्तन हुए जिसमे न्यूनतम विनाश हुया। सृजनात्मक शक्ति कश्यप की ज्यादा रही गौतम की तुलना में पर विम्रता और इस्वर में निष्ठा में पीछे रहे जिससे एक ब्राह्मण में मानवता का जो स्थान गौतम का है उसकी दृस्टि से कश्यप पीछे रहे और इसी लिए कश्यप प्रोफेसर पाण्डेय भी इस महा युद्ध/महा समुद्र मंथन में लगभग तीन बार सशरीर बिशुनपुर-223103 , जौनपुर/जमदग्निपुर में स्वयं उपस्थित हो अपने से पद और उम्र दोनों में छोटे गौतम गोत्रीय लोगों से आशीर्वाद और शक्ति अर्जित किये कार्यपूर्ती हेतु जिसका की मई गवाह हूँ किशी को अगर न दिखाई दिया हो।

वरिष्ठता बस्ती जनपद से आये सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/रामप्रसाद/रामअवध/गजाधर/आदिशंकर/सतीश/सुभाष/अभयचंद  (रामापुर-223225, आजम(महान)गढ़/आर्यमगढ़/महान लोगों का स्थान) की रही और श्रेष्ठता गोरखपुर जनपद से आये सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण बाबा निवाजी/रामानंद/रामानुज(लक्षमण)/श्रीनिवाश(विष्णु)/रामप्रशाद/रमानाथ(बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्निपुर) की रही एक ब्राह्मण के रूप में तो मई क्या कहता?  मुझे मान्य है की दुनिया को चमत्कारिक बनाने के लिए कुछ नियम टूटते है पर इसका मतलब यह नहीं की पूर्ण निर्धारित नियम तोड़ दें और ऐसा हुआ था और अगर ऐसा हुआ था तो "सत्यमेव जयते"/"सुदर्शन चक्र" ने अपना काम किया अशोकचक्र/शिव के कालचक्र/समय चक्र/24 ऋषियों के धर्मचक्र के स्थान पर और इस प्रकार विश्व व्यापक परिवर्तन हुए जिसमे न्यूनतम विनाश हुया।  सृजनात्मक शक्ति कश्यप की ज्यादा रही गौतम की तुलना में पर विम्रता और इस्वर में निष्ठा में पीछे रहे जिससे एक ब्राह्मण में मानवता का जो स्थान गौतम का है उसकी दृस्टि से कश्यप पीछे रहे और इसी लिए कश्यप प्रोफेसर पाण्डेय भी इस महा युद्ध/महा समुद्र मंथन में लगभग तीन बार सशरीर बिशुनपुर-223103 , जौनपुर/जमदग्निपुर में स्वयं उपस्थित हो अपने से पद और उम्र दोनों में छोटे गौतम गोत्रीय लोगों से आशीर्वाद और शक्ति अर्जित किये कार्यपूर्ती हेतु जिसका की मई गवाह हूँ किशी को अगर न दिखाई दिया हो। 

Friday, April 17, 2015

पांच हजार वर्ष पूर्व के एक सूर्यवंशीय ग्वाले(जिसने केदारनाथ और पशुपतिनाथ को अलग किया था सामाजिक मर्यादा की रक्षा हेतु और पुनः उनको इस प्रयागराज में केदारेश्वर का रूप दे दिया जोड़कर और इस प्रकार प्रायश्चित पूर्ण किया शिवांश को पूर्ण शिव बनाकर) के अनुभवानुसार जो की वर्तमान में एक कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय सनातन ब्राह्मण है इस सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों के नाम से चले सात मूलभूत गोत्र गौतम, वशिष्ठ/पारासर/व्यास, कश्यप/मारीच, आंगिरस/भारद्वाज/गुरुबृहस्पति, भृगु/जमदाग्नि(परशुराम)/भार्गव/दधीचि/शुक्राचार्य, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय(दत्त)/सोमात्रेय(सोमा), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ में गौतम सबसे श्रेष्ठ और कश्यप सबसे वरिष्ठ है। इसको कोई भी इस सूर्यवंशीय ग्वाले की तरह जीवन यापन कर एक सनातन ब्राह्मण परिवार में जन्म पा अनुभव कर सकता है। रही अन्य की तो वशिष्ठ सबसे श्रेष्ठ गुरु, आंगिरस/भारद्वाज सबसे बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक, भृगु/जमदग्नि(परशुराम) सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोचित गुण/लक्षणों वाले, अत्रि/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) सबसे तेजस्वी, और कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ/सूर्य:गायत्रीमंत्र के प्रणेता जो सबसे छोटे है ये सबसे बड़े योद्धा और क्षत्रिय गुण वाले इसीलिये इनको अशोकचक्र/समयचक्र/शिव का कालचक्र/ 24 ऋषियों का धर्म चक्र में सबसे प्रमुख और पहला स्थान है जिसमे याज्ञवल्क जी को 24 वां स्थान मिलता है। एक सबसे प्रमुख रहस्य यह की आंगिरस के संतति गुरु बृहस्पति जो देवताओं के गुरु है और भृगु की संतति शुक्राचार्य जो दैत्यों के गुरु हैं के साथ विशेष बात यह रही की दुनिया के लगभग सभी देवता भी कश्यप/अदिति के पुत्र और दुनिया के अधिकतम दैत्य भी कश्यप/दिति(अदिति की बड़ी बहन) इस प्रकार दिति और अदिति के काशी के दक्ष प्रजापति की पुत्री होने के नाते सभी के परनाना ब्रह्मदेव ही हुए क्योंकि काशी के दक्ष प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र थे। अगर सातों ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि ब्रह्मा के मानस पुत्र थे तो विवेक, ज्ञान, और विद्या ये सरस्वती के मानस पुत्र हैं। तो ऐसे में मै विवेक स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण होने के नाते वरिष्ठ हूँ और अधिकतम देव और दानव मुझसे सम्बंधित है तो मै निर्धारित करता हूँ की शान्तिभंग होने से पहले किशी तथ्य तक सबसे पहले पहुंचा जाय और समस्या का विकल्प ग्राउंड जीरो से खोजा जाय और जब नहीं संभालता है तो कोई न कोई कश्यप गोत्रीय श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्म लेगा और दोषी व्यक्ति को उचित सजा देगा ही इसमे कोई तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता नहीं देखी जाएगी और न कितना नुक्सान हुआ यह देखा जाएगा क्योंकि बता दिया गया है की दुनिया एक(परमब्रह्म) है तब भी चलेगी, तीन(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) उससे हुए तब भी चलेगी, उससे चार(दूसरा परमब्रह्म हनुमान/नारद) हुए तब भी चलेगी और सब युगल हुए मतलब आठ हुए तब भी चलेगी सात और हुए तब भी चलेगी और एक(अगस्त्य/कुम्भज ऋषि) हुए तब भी चलगी और आज जितने हम हैं इतनी रही तब भी चलेगा और इससे बहुत कम हो जाएगी तब भी चलेगी लेकिन अगर पूर्ण निर्धारित सत्य शेष नहीं रह गया इस तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता के पालन में तो कुछ भी नहीं बचेगा जैसा की नयी सहस्राब्दी के संक्रमण काल में कभी भी घटित होने वाला था और सांकेतिक रूप में कुछ हुआ भी था।-------जो घटना के रहस्य के जानकार हैं उनको अबकी बार भृगुवंशी शुक्राचार्य का काम किये या आंगिरस/भरद्वाज गोत्रीय शुक्राचार्य का कार्य किये इसको लेकर संदेह में है जबकि अमूमन यह होता है कि आंगिरस/भारद्वाज गोत्रीय गुरुब्रह्स्पति का कार्य करते हैं न कि शुक्राचार्य का जिसे इस विश्व समाज को ज्ञात करना है पर कश्यप गोत्रियों ने कार्य पूर्ण कर जिसको वे गुरु वृहस्पति समझते थे प्रारंभिक युग में उस आंगिरस गुरुदेव को यज्ञ समापन करवा पूर्ण लक्ष्य प्राप्त की घोसना कर चुके हैं। वर्तमान में जो भी विशेष व्यक्ति या उसका समूह जो कुछ भी कर रहा है वह सब भविष्य को बचाने के लिए अभी से अंकित किया जा रहा है जिन व्यक्तियों को इस संसार को चलाने का दायित्व इस समय दिया गया है और व्यक्ति और व्यक्ति समूह का कार्य उसका भविष्य निर्धारित करेगा। अतः अपने कर्मो के प्रति जबाब देह होते हुए कुछ आप लोग करें तो अधिकतम समाज हित होगा।

पांच हजार वर्ष पूर्व के एक सूर्यवंशीय ग्वाले(जिसने केदारनाथ और पशुपतिनाथ को अलग किया था सामाजिक मर्यादा की रक्षा हेतु और पुनः उनको इस प्रयागराज में केदारेश्वर का रूप दे दिया जोड़कर और इस प्रकार प्रायश्चित पूर्ण किया शिवांश को पूर्ण शिव बनाकर)  के अनुभवानुसार जो की वर्तमान में एक कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय सनातन ब्राह्मण है इस सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों के नाम से चले सात मूलभूत गोत्र गौतम, वशिष्ठ/पारासर/व्यास, कश्यप/मारीच, आंगिरस/भारद्वाज/गुरुबृहस्पति, भृगु/जमदाग्नि(परशुराम)/भार्गव/दधीचि/शुक्राचार्य, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय(दत्त)/सोमात्रेय(सोमा), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ में गौतम सबसे श्रेष्ठ और कश्यप सबसे वरिष्ठ है। इसको कोई भी इस सूर्यवंशीय ग्वाले की तरह जीवन यापन कर एक सनातन ब्राह्मण परिवार में जन्म पा अनुभव कर सकता है। रही अन्य की तो वशिष्ठ सबसे श्रेष्ठ गुरु, आंगिरस/भारद्वाज सबसे बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक, भृगु/जमदग्नि(परशुराम) सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोचित गुण/लक्षणों वाले, अत्रि/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) सबसे तेजस्वी, और कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ/सूर्य:गायत्रीमंत्र के प्रणेता जो सबसे छोटे है ये सबसे बड़े योद्धा और क्षत्रिय गुण वाले इसीलिये इनको अशोकचक्र/समयचक्र/शिव का कालचक्र/ 24 ऋषियों का धर्म चक्र में सबसे प्रमुख और पहला स्थान है जिसमे याज्ञवल्क जी को 24 वां स्थान मिलता है।  एक सबसे प्रमुख रहस्य यह की आंगिरस के संतति गुरु बृहस्पति जो देवताओं के गुरु है और भृगु की संतति शुक्राचार्य जो दैत्यों के गुरु हैं के साथ विशेष बात यह रही की दुनिया के लगभग सभी देवता भी कश्यप/अदिति के पुत्र और दुनिया के अधिकतम  दैत्य भी कश्यप/दिति(अदिति की बड़ी बहन) इस प्रकार दिति और अदिति के काशी के दक्ष प्रजापति की पुत्री होने  के नाते सभी के परनाना ब्रह्मदेव ही हुए क्योंकि  काशी के दक्ष प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र थे। अगर सातों ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि ब्रह्मा के मानस पुत्र थे तो विवेक, ज्ञान, और विद्या ये सरस्वती के मानस  पुत्र हैं।  तो ऐसे में मै विवेक स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण होने के नाते वरिष्ठ हूँ और अधिकतम देव और दानव मुझसे सम्बंधित है तो मै निर्धारित करता हूँ की शान्तिभंग होने से पहले किशी तथ्य तक सबसे पहले पहुंचा जाय और समस्या का विकल्प ग्राउंड जीरो से खोजा जाय और जब नहीं संभालता है तो कोई न कोई कश्यप गोत्रीय श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्म लेगा और दोषी व्यक्ति को उचित सजा देगा ही इसमे कोई तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता नहीं देखी जाएगी और न कितना नुक्सान हुआ यह देखा जाएगा क्योंकि बता दिया  गया है की दुनिया एक(परमब्रह्म) है तब भी चलेगी, तीन(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) उससे हुए तब भी चलेगी, उससे चार(दूसरा परमब्रह्म हनुमान/नारद) हुए तब भी चलेगी  और सब युगल हुए मतलब आठ हुए तब भी चलेगी  सात और हुए तब भी चलेगी और एक(अगस्त्य/कुम्भज ऋषि) हुए तब भी चलगी और आज जितने हम हैं इतनी रही तब भी चलेगा और इससे बहुत कम हो जाएगी तब भी चलेगी लेकिन अगर पूर्ण निर्धारित सत्य शेष नहीं रह गया इस तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता के पालन में तो कुछ भी नहीं बचेगा जैसा की नयी सहस्राब्दी के संक्रमण काल में  कभी भी घटित होने वाला था और सांकेतिक रूप में कुछ हुआ भी था।-------जो घटना के रहस्य के जानकार हैं उनको अबकी बार भृगुवंशी शुक्राचार्य का काम किये या आंगिरस/भरद्वाज गोत्रीय शुक्राचार्य का कार्य किये इसको लेकर संदेह में है जबकि अमूमन यह होता है कि आंगिरस/भारद्वाज गोत्रीय गुरुब्रह्स्पति का कार्य करते हैं  न कि शुक्राचार्य का जिसे इस विश्व समाज को ज्ञात करना है पर कश्यप गोत्रियों ने कार्य पूर्ण कर जिसको वे गुरु वृहस्पति समझते थे प्रारंभिक युग में उस आंगिरस गुरुदेव को यज्ञ समापन करवा पूर्ण लक्ष्य प्राप्त की घोसना कर चुके हैं। वर्तमान में जो भी विशेष व्यक्ति या उसका समूह जो कुछ भी कर रहा है वह सब भविष्य को बचाने के लिए अभी से अंकित किया जा रहा है जिन व्यक्तियों को इस संसार को चलाने का दायित्व इस समय दिया गया है और व्यक्ति और व्यक्ति समूह का कार्य उसका भविष्य निर्धारित करेगा। अतः अपने कर्मो के प्रति जबाब देह होते हुए कुछ आप लोग करें तो अधिकतम समाज हित होगा।

नमामि त्रिदेवे (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को शक्ति प्रदानकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अस्तित्व को मूलभूत सृस्टि संचालक बनाने वाले: बाकी सब जाती/धर्म की उत्पत्ति के स्रोत यही हैं) इन तीन प्रथम नागरिक त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) को अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो इनको माधव कहा गया है मतलब इनको जन्म देने वाला कोई नहीं होता ये प्रकट होते है और इस सृस्टि में यह तीन शक्ति एक तीन से दूसरे तीन व्यक्ति या किशी एक ही व्यक्ति में स्थान्तरित होते रहते हैं। मैंने आप लोगों को यही सन्देश दिया है की जब तक इस सृस्टि में दाल, चावल और आटा रहेगा तभी तक मिलावटी भोजन आप बना सकते हैं तरह-तरह के वे स्वादिष्ट और अच्छे गुणवत्ता वाले हो सकते हैं पर स्थायित्व आप को दाल, चावल और आटा पर ही आकर मिलेगा और आप की मूल शक्ति भी दाल, चावल और आंटे से ही आंकी जाएगी और जब विनाश की घड़ी आयी थी तब भी आप इसी दाल, चावल और आंटे को ही आगे किये थे नियंत्रित करने के लिए आप के अंदर जो भी तत्व जिससे सम्बंधित था अलग-अलग हो इसी दाल, चावल और आंटे में मिलने लगा और इन तीनों को नियंत्रक की स्थिति में आने को बाध्य कर दिया। आप को इसलिए बाप/जनक/दशरथ/वशुदेव से युद्ध नहीं करना चाहिए और आप दाल, चावल और आंटे के अस्तित्व पर कभी भी प्रश्न चिन्ह न लगाईयेगा लजीज व्यंजन इससे बना कर इतराते हुए। नमामि त्रिदेवे जिनको अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो।

नमामि त्रिदेवे (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को शक्ति प्रदानकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अस्तित्व को मूलभूत सृस्टि संचालक बनाने वाले: बाकी सब जाती/धर्म की उत्पत्ति के स्रोत यही हैं)  इन तीन प्रथम नागरिक त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) को अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो इनको माधव कहा गया है मतलब इनको जन्म देने वाला कोई नहीं होता ये प्रकट होते है और इस सृस्टि में यह तीन शक्ति एक तीन से दूसरे तीन व्यक्ति या किशी एक ही व्यक्ति में स्थान्तरित होते रहते हैं। मैंने आप लोगों को यही सन्देश दिया है की जब तक इस सृस्टि में दाल, चावल और आटा रहेगा तभी तक मिलावटी भोजन आप बना सकते हैं तरह-तरह के वे स्वादिष्ट और अच्छे गुणवत्ता वाले हो सकते हैं पर स्थायित्व आप को दाल, चावल और आटा पर ही आकर मिलेगा और आप की मूल शक्ति भी दाल, चावल और आंटे से ही आंकी जाएगी और जब विनाश की घड़ी आयी थी तब भी आप इसी दाल, चावल और आंटे को ही आगे किये थे नियंत्रित करने के लिए आप के अंदर जो भी तत्व जिससे सम्बंधित था अलग-अलग हो इसी दाल, चावल और आंटे में मिलने लगा और इन तीनों को नियंत्रक की स्थिति में आने को बाध्य कर दिया। आप को इसलिए बाप/जनक/दशरथ/वशुदेव से युद्ध नहीं करना चाहिए और आप दाल, चावल और आंटे के अस्तित्व पर कभी भी प्रश्न चिन्ह न लगाईयेगा  लजीज व्यंजन इससे बना कर इतराते हुए। नमामि त्रिदेवे जिनको अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो।

गौतम गोत्रीय अत्यंत शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं का क्षेत्र रहा है अवध और काशी का बफर क्षेत्र(आजमगढ़) जिनका अवध के राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध(सूर्यवंश/कश्यप का गौतम से सम्बन्ध जो मान्य है उत्तर भारतीयों में ) रहे हैं आदिकाल से जिसके अंतिम राजा विक्रमजीत/विक्रमादित्य रहे है| गौतम गोत्रीय शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं ने चंगेज खान को भी इस क्षेत्र में घुसने नहीं दिया जो की बंगाल और बिहार तक चला गया जौनपुर होते हुए लेकिन इस इंच भूमि भी इन गौतम गोत्रीय क्षत्रियों की नहीं प्राप्त कर सका। भारत में अंग्रेजों के प्रथम पदार्पण हो जाने पर ऐसे शूर वीर गौतम गोत्रीय क्षत्रियों ने वैवाहिक सम्बन्ध इस्लाम अनुयायी कन्या से करके भारत के सबसे अलग और अंतिम क्षत्रिय राजा की उपाधि धारण किये जिन्होंने अपने पुत्रों को नाम इस्लाम जगत का रखा और वे दो पुत्र थे आज़म और अज़मत और इनकी यही शूरवीरता इस्लाम अनुयायी हो जाने पर भी आज तक बनी है जो आन-बान-शान पर मर मिटने वाले है वक्त दर वक्त इस देश और समाज के लिए। पर हो सकता है कुछ स्थिर और एक निश्चित सीमा तक सोचने वाले इनको ठीक से समझने में भूल कर देते हों क्योंकि वाह्य दुनिया से इनका सम्बन्ध बहुत पुराना है।

गौतम गोत्रीय अत्यंत शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं का क्षेत्र रहा है अवध और काशी का बफर क्षेत्र(आजमगढ़) जिनका अवध के राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध(सूर्यवंश/कश्यप का गौतम से सम्बन्ध जो मान्य है उत्तर भारतीयों में ) रहे हैं आदिकाल से जिसके अंतिम राजा विक्रमजीत/विक्रमादित्य रहे है| गौतम गोत्रीय शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं ने चंगेज खान को भी इस क्षेत्र में घुसने नहीं दिया जो की बंगाल और बिहार तक चला गया जौनपुर होते हुए लेकिन इस इंच भूमि भी इन गौतम गोत्रीय क्षत्रियों की नहीं प्राप्त कर सका। भारत में अंग्रेजों के प्रथम पदार्पण हो जाने पर ऐसे शूर वीर गौतम गोत्रीय क्षत्रियों ने वैवाहिक सम्बन्ध इस्लाम अनुयायी कन्या से करके भारत के सबसे अलग और अंतिम क्षत्रिय राजा की उपाधि धारण किये जिन्होंने अपने पुत्रों को नाम इस्लाम जगत का रखा और वे दो पुत्र थे आज़म और अज़मत और इनकी यही शूरवीरता इस्लाम अनुयायी हो जाने पर भी आज तक बनी है जो आन-बान-शान पर मर मिटने वाले है वक्त दर वक्त इस देश और समाज के लिए। पर हो सकता है कुछ स्थिर और एक निश्चित सीमा तक सोचने वाले इनको ठीक से समझने में भूल कर देते हों क्योंकि वाह्य दुनिया से इनका सम्बन्ध बहुत पुराना है।
  Re; मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।  

इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।>>>>>मेरी जहां तक बात है तो न की मेरे गाँव बल्कि आजमगढ़ के मेरे पांच गाँव(रामापुर-223225, लग्गूपुर, औराडार, गुमकोठी, बाग़बहार) और स्वयं ओरिल के सभी लोगों के पुरोधा कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय संतान ब्राह्मण, बाबा सारंग(चन्द्र)धर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर जिनको एक मुस्लिम/इस्लाम अनुयायी हो चुके जागीरदार ने ये सब गांव दान में दिए थे इस बस्ती जनपद से आये बाबा जी को किन्तु दादी/माता जौनपुर जनपद के पास की थीं तो पूरा जौनपुर हम लोगों का मामा है। और जौनपुर विश्वगुरु है तो जाहिर सी बात है की हम लोगों की प्रथम गुरु हमारी माता है उत्तराधिकार पिता से हमें भले ही प्राप्त हो। यह मेरे लिए सुनहरा अवसर था की मई जौनपुर में ही सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण दादी के यहां(भरारी/भर्रारी-223203) जन्म लिया और सनातन गौतम गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण माता के यहां(बिशुनपुर-223103) जीवन का अधिकतम समय व्यतीत किया और वही से ऊर्जा भी लेता हूँ अभी तक आवश्यक पड़ने पर। इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।

 इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।>>>>>मेरी जहां तक बात है तो न की मेरे गाँव बल्कि आजमगढ़ के मेरे पांच गाँव(रामापुर-223225, लग्गूपुर, औराडार, गुमकोठी, बाग़बहार) और स्वयं ओरिल के सभी लोगों के पुरोधा कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय संतान ब्राह्मण, बाबा सारंग(चन्द्र)धर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर जिनको एक मुस्लिम/इस्लाम अनुयायी हो चुके जागीरदार ने ये सब गांव दान में दिए थे इस बस्ती जनपद से आये बाबा जी को किन्तु दादी/माता जौनपुर जनपद के पास की थीं तो पूरा जौनपुर हम लोगों का मामा है। और जौनपुर विश्वगुरु है तो जाहिर सी बात है की हम लोगों की प्रथम गुरु हमारी माता है उत्तराधिकार पिता से हमें भले ही प्राप्त हो। यह मेरे लिए सुनहरा अवसर था की मई जौनपुर में ही सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण दादी के यहां(भरारी/भर्रारी-223203) जन्म लिया और सनातन गौतम गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण माता के यहां(बिशुनपुर-223103) जीवन का अधिकतम समय व्यतीत किया और वही से ऊर्जा भी लेता हूँ अभी तक आवश्यक पड़ने पर।  इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।        

Thursday, April 16, 2015

आप लोगों को एक कहानी जीवन की सुनानी है की अतिथि देवो भव और सत्यम शिवम सुंदरम के लिए कुछ कैसे त्याग सकते है: गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सरस्वतीमहिमा महती महीयताम्), समोधपुर, जौनपुर/जमदग्निपर से हम, तेज प्रताप सिंह, संजीव उपाध्याय, श्रीकृष्ण पाण्डेय, शुभाष पाण्डेय भौतिकी (एलेक्ट्रॉनिक्स) में परास्नातक छात्र थे तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सत्यम शिवम सुंदरम) , जौनपुर में और वहां भूपतिपत्ति के एक बाबू साहब के मकान में रहते थे जो प्रोफेसर थे कलकत्ता विश्वविद्यालय में और बरसठी, जौनपुर उनका पैतृक निवास था। हम लोगों के साथ संजय मिश्रा जी रहते थे जो रसायन विज्ञान के छात्र थे इसी कालेज में और सब एक साथ में रहने के कारन जब कोई अकेला पड़ जाता है तो जाहिर सी बात है की उसका मन कमरे पर नहीं लगता और आज की तरह मोबाइल भी नहीं था की इंटरनेट और गाना लगा के बिजी रहे कोई। तो एक दिन रसायनशास्त्र की कक्षा नहीं चलनी थी और संजय कहे की भाई हम भी चलते हैं और आप लोगों के साथ भौतिकी पढ़ते है यहाँ रूम पर बैठकर क्या करेंगे। मने मना किया पर हम सभी गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय समोधपुर से थे तो सभी और चार मित्रों ने कहा चलने दीजिये बहुत होगा कोई शिक्षक बार निकल देगा अगर ध्यान देगा तब। विभागाध्यक्ष डॉ विजय नारायण गुप्ता की कक्षा लगी और वे पढ़ाते समय कुछ पूंछने लगे एक दिन पहले के क्लास से सम्बंधित क्रम में होने से तो अब संजय की बारी आ गयी। उन्होंने पूंछ की आप कौन बाकी को तो मई जनता हूँ, तो संजय बोले रसायन शास्त्र का छात्र हूँ वह कुछ मित्र मुझे यहां लाये हैं। किसके साथ आये हैं खड़े होइए! कोई वह मित्र नहीं खड़ा हो रहा जो संजय को विशेष रूप से लाया था| मई सोचा की यह तो ठीक नहीं है संजय को अपमानित ज्यादा होना पड़ रहा है। अतः मैंने कहा की गुरूजी मई लेके आया हूँ। वे बोले की चक्के महाविद्यालय से हो, नहीं गांधी स्मारक महाविद्यालय समोधपुर, जौनपुर से। तो क्या ऐसा समोधपुर वाले कर सकते हैं क्या? दिन बीत गया किशी तरह से पर मई सोच लिया की इस कॉलेज को छोड़ना है विभागाध्यक्ष की नजर में सब ठीक नहीं रहा और संयोग से अगस्त में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(विद्यायामृतसमसनुते), वाराणसी पहुँच गया। वहा प्रोफेसर फूल चंद मिश्रा से मिलाने जब वे एक बार आये थे तो प्रणाम कर आशीर्वाद लेने पर परिचय बताया तो वे मुस्कारे लगे। यह था सत्य को स्वीकारने और अतिथि देवो भव का परिणाम और उससे सम्बंधित एक छोटी सी घटना जिसमे संजय को मैंने लाया था यह अधूरा सत्य था क्योंकि मैंने उनको मना किया था और जब मित्र लोग नही माने तो मई कहा ठीक है चलिए और एक अतिथि हो चुके भौतिकी की कक्षा में आकर संजय मिश्रा जी।

आप लोगों को एक कहानी जीवन की सुनानी है की अतिथि देवो भव और सत्यम शिवम सुंदरम के लिए कुछ कैसे त्याग सकते है: गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सरस्वतीमहिमा महती महीयताम्), समोधपुर, जौनपुर/जमदग्निपर से हम, तेज प्रताप सिंह, संजीव उपाध्याय, श्रीकृष्ण पाण्डेय, शुभाष पाण्डेय भौतिकी (एलेक्ट्रॉनिक्स) में परास्नातक छात्र थे तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सत्यम शिवम सुंदरम) , जौनपुर में और वहां भूपतिपत्ति के एक बाबू साहब के मकान में रहते थे जो प्रोफेसर थे कलकत्ता विश्वविद्यालय में और बरसठी, जौनपुर उनका पैतृक निवास था। हम लोगों के साथ संजय मिश्रा जी रहते थे जो रसायन विज्ञान के छात्र थे इसी कालेज में और सब एक साथ में रहने के कारन जब कोई अकेला पड़ जाता है तो जाहिर सी बात है की उसका मन कमरे पर नहीं लगता और आज की तरह मोबाइल भी नहीं था की इंटरनेट और गाना लगा के बिजी रहे कोई। तो एक दिन रसायनशास्त्र की कक्षा नहीं चलनी थी और संजय कहे की भाई हम भी चलते हैं और आप लोगों के साथ भौतिकी पढ़ते है यहाँ रूम पर बैठकर क्या करेंगे। मने मना किया पर हम सभी गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय समोधपुर से थे तो सभी और चार मित्रों ने कहा चलने दीजिये बहुत होगा कोई शिक्षक बार निकल देगा अगर ध्यान देगा तब। विभागाध्यक्ष डॉ विजय नारायण गुप्ता की कक्षा लगी और वे पढ़ाते समय कुछ पूंछने लगे एक दिन पहले के क्लास से सम्बंधित क्रम में होने से तो अब संजय की बारी आ गयी। उन्होंने पूंछ की आप कौन बाकी को तो मई जनता हूँ, तो संजय बोले रसायन शास्त्र का  छात्र हूँ वह कुछ मित्र मुझे यहां लाये हैं। किसके साथ आये हैं खड़े होइए! कोई वह मित्र नहीं खड़ा हो रहा जो संजय को विशेष रूप से लाया था| मई सोचा की यह तो ठीक नहीं है संजय को अपमानित ज्यादा होना पड़  रहा है। अतः मैंने कहा की गुरूजी मई लेके आया हूँ। वे बोले की चक्के महाविद्यालय से हो, नहीं गांधी स्मारक महाविद्यालय समोधपुर, जौनपुर से। तो क्या ऐसा समोधपुर वाले कर सकते हैं क्या?  दिन बीत गया किशी तरह से पर मई सोच लिया की इस कॉलेज को छोड़ना है विभागाध्यक्ष की नजर में सब ठीक नहीं रहा और संयोग से अगस्त में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(विद्यायामृतसमसनुते), वाराणसी पहुँच गया। वहा प्रोफेसर फूल चंद मिश्रा से मिलाने जब वे एक बार आये थे तो प्रणाम कर आशीर्वाद लेने पर परिचय बताया तो वे मुस्कारे लगे। यह था सत्य को स्वीकारने और अतिथि देवो भव का परिणाम और उससे सम्बंधित एक छोटी सी घटना जिसमे संजय को मैंने लाया था यह अधूरा सत्य था क्योंकि मैंने उनको मना किया था और जब मित्र  लोग नही माने तो मई कहा ठीक है चलिए और एक अतिथि हो चुके भौतिकी की कक्षा में आकर संजय मिश्रा जी।     

In the RAM/KRISHNA HOSTEL, BANARAS HINDU UNIVERSITY, Varanasi, I was the person mimicry zed by ATAL and JOSHI due to favoring BJP and RSS in comparison with the so called social justice Parties like BSP, SP and RJD those had full regional control in UP and Bihar at that time of 1998-2000 although in the center there was BJP Govt. There is a huge change in the vision and thoughts of these parties due to recognizance of their own person in the Brahmin/Sawarns. At that time(1998-2000) this so called social justice was based on Brahmin/ Savarns specially versus non-Brahmin/Savarn and now at this time it is 87%(BRAHMIN+KSHATRIY+ VAISYA+ all their Mixed from) versus other one i.e. 13% >>>This is the true struggle for which my sacrifice played good role. With this progress I am satisfied and hope a time will come very soon when there will be no need of so called social justice by Govt. forming parties but we all be based on the Suprem Power GOD i.e. Suprem DEEN DAYAL. This was myself on orkut at Indian Institute of Science, Bangalore that If India Govt. is not giving Bharat Ratn to Atal ji then I will give RAM RATN to ATAL JI and KRISHN RATNA TO JOSHI JI. I hope Vishnukant(Rashi name Venkatesh, Thursday, 30-09-2010, SHRI Ram Janmbhoomi clear cut decision in favor of Ram-lala with social boundary ) is Ram Ratn and Krishnakant(Rashi name Vaashudev, Wednesday, 28-08-2013, ShriKrishn Janmastami) is the Krishn Ratn. I assume both will be with us and will memorized for them in future.

In the RAM/KRISHNA HOSTEL, BANARAS HINDU UNIVERSITY, Varanasi, I was the person mimicry zed by ATAL and JOSHI due to favoring BJP and RSS in comparison with the so called social justice Parties like BSP, SP and RJD those had full regional control in UP and Bihar at that time of 1998-2000 although in the center there was BJP Govt. There is a huge change in the vision and thoughts of these parties due to recognizance of their own person in the Brahmin/Sawarns. At that time(1998-2000) this so called social justice was based on Brahmin/ Savarns specially versus non-Brahmin/Savarn and now at this time it is 87%(BRAHMIN+KSHATRIY+ VAISYA+ all their Mixed from) versus other one i.e. 13% >>>This is the true struggle for which my sacrifice played good role. With this progress I am satisfied and hope a time will come very soon when there will be no need of so called social justice by Govt. forming parties but we all be based on the Suprem Power GOD i.e. Suprem DEEN DAYAL. This was myself on orkut at Indian Institute of Science, Bangalore that If India Govt. is not giving Bharat Ratn to Atal ji then I will give RAM RATN to ATAL JI and KRISHN RATNA TO JOSHI JI. I hope Vishnukant(Rashi name Venkatesh, Thursday, 30-09-2010, SHRI Ram Janmbhoomi clear cut decision in favor of Ram-lala with social boundary ) is Ram Ratn and Krishnakant(Rashi name Vaashudev, Wednesday, 28-08-2013, ShriKrishn Janmastami) is the Krishn Ratn. I assume both will be with us and will memorized for them in future.