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Thursday, July 30, 2015

व्यापक प्रश्न व्यापक भारतीय समाज से की कि अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को प्रोत्साहित करने वाले कितने आप गैर ब्राह्मण लोग अपने घर पर आप की ही जाती/धर्म की लड़की से विवाह किये हुए ब्राह्मण को अपना पुरोहित स्वीकार करेंगे? और अगर वह ब्राह्मण, व्यभिचारी, मद्यप और हर तरह की चारित्रिक बुराइयों में लगा हो तो क्या आप उसको अपना पुरोहित बना रहने देंगे? क्या आप को विश्वास है की वह पूजा पध्धति के दौरान आप के घर में कभी कोई कुकृत्य नहीं करेगा मौक़ा लगाने पर यदि उसके अंदर सब तरह की बुराइया मौजूद हैं उसमे? उसी तरह से सभी जाती और धर्म के संभ्रांत व्यक्ति अपना नौकर भी कम से कम उपर्युक्त कमियों वाला भी नहीं चाहता है? तो क्यों न हम एक सुआचारयुक्त समाज को बने रहने दें और अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को कम मान्यता और प्रसय दें जहाँ से कोई दूसरी जिंदगी और दूसरी राह संभव न हो सके उन दोनों के लिए मतलब सामान्य स्थिति में इससे ज्यादा से ज्यादा बचा जाय। *******जय हिन्द।

व्यापक प्रश्न व्यापक भारतीय समाज से की कि अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को प्रोत्साहित करने वाले कितने आप गैर ब्राह्मण लोग अपने घर पर आप की ही जाती/धर्म की लड़की से विवाह किये हुए ब्राह्मण को अपना पुरोहित स्वीकार करेंगे? और अगर वह ब्राह्मण, व्यभिचारी, मद्यप और हर तरह की चारित्रिक बुराइयों में लगा हो तो क्या आप उसको अपना पुरोहित बना रहने देंगे? क्या आप को विश्वास है की वह पूजा पध्धति के दौरान आप के घर में कभी कोई कुकृत्य नहीं करेगा मौक़ा लगाने पर यदि उसके अंदर सब तरह की बुराइया मौजूद हैं उसमे? उसी तरह से सभी जाती और धर्म के संभ्रांत व्यक्ति अपना नौकर भी कम से कम उपर्युक्त कमियों वाला भी नहीं चाहता है? तो क्यों न हम एक सुआचारयुक्त समाज को बने रहने दें और अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को कम मान्यता और प्रसय दें जहाँ से कोई दूसरी जिंदगी और दूसरी राह संभव न हो सके उन दोनों के लिए मतलब सामान्य स्थिति में इससे ज्यादा से ज्यादा बचा जाय। *******जय हिन्द।

विवेक(गिरधर):---हनुमान: जाके बल से गिरिवर(हिमालय) कांपे रोग दोष सब निकट न झांके।; गिरिधर का प्रथम धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान(महादेव/रूद्र का ग्यारहवा अवतार); गिरधर द्वितीय गोवर्धन धारी श्रीकृष्णश्रीकृष्ण(सशरीर परमब्रम्ह)।; गिरधर तृतीय मेरु:-मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु; गिरधर चतुर्थ:- धरणीधर शेषनाग; विवेक:- त्रिनेत्र, त्रिलोचन, त्रयम्बक(स्वयं शक्ति के स्वामी महादेव की भी स्वयं की रक्षा शक्ति विवेक ही है जिसके बिना स्वयं त्रिदेव भी शूद्रवत् हो सकते है: जिस प्रकार ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र दक्ष प्रजापति के अलावा ब्रह्मा के सात मानस पुत्र मतलब सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि उसी तरह सरस्वती के चार मानस संतान विवेक-प्रज्ञा और ज्ञान-विद्या)। साथ ब्रह्मर्षि वरिष्ठता/श्रेष्ठता अनुसार: कश्यप/गौतम, वशिष्ठ, गौतम/कश्यप, अंगिरस, भृगु, अत्रि, विश्वामित्र=कौशिक=विश्वरथ) ।

विवेक(गिरधर):---हनुमान:  जाके बल से गिरिवर(हिमालय) कांपे रोग दोष सब निकट न झांके।;
गिरिधर का प्रथम धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान(महादेव/रूद्र का ग्यारहवा अवतार);
गिरधर द्वितीय गोवर्धन धारी श्रीकृष्णश्रीकृष्ण(सशरीर परमब्रम्ह)।;  
गिरधर तृतीय मेरु:-मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु;
गिरधर चतुर्थ:- धरणीधर शेषनाग;
विवेक:- त्रिनेत्र, त्रिलोचन, त्रयम्बक(स्वयं शक्ति के स्वामी महादेव की भी स्वयं की रक्षा शक्ति विवेक ही है जिसके बिना स्वयं त्रिदेव भी शूद्रवत् हो सकते है: जिस प्रकार ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र दक्ष प्रजापति के अलावा ब्रह्मा के सात मानस पुत्र मतलब सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि उसी तरह सरस्वती के चार मानस संतान विवेक-प्रज्ञा और ज्ञान-विद्या)। साथ ब्रह्मर्षि वरिष्ठता/श्रेष्ठता अनुसार: कश्यप/गौतम, वशिष्ठ, गौतम/कश्यप, अंगिरस, भृगु, अत्रि, विश्वामित्र=कौशिक=विश्वरथ) ।  

Wednesday, July 29, 2015

राजा यदु भी चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे पर अपने चन्द्रवंशीय भाइयों द्वारा लगातार उपेक्षित किये जाने से व्यथित हो अपने पाँचों पुत्रों से कहा की मेरा नया वंश चलेगा और तुम सब चंद्रवंशी से एक कदम दूर हो मेरे नाम के वंश को आगे बढ़ाओ गए और इस प्रकार तुम सब पहले यदुवंशीय हो और तुम्हारी आने वाली सभी पीढ़िया यदुवंशी ही होंगे। यह है इस दुनिया का पांच अंक से लगाव, पर यह पांच अंक का लगाव स्वयं में तीन अंक के लगाव को संरक्षण और समर्थन के लिए हैं, न की आपस में विद्वेष और घृणा फैलाने तथा अनायास एक दूसरे का विरोध करने के लिए हैं। इसी चन्द्रवंश के यदुवंश की एक शाखा, वृष्णि वंश में योगयोगेश्वर जनार्दन श्रीकृष्ण का जन्म हुआ जो दुनिया के आजतक के इतिहास में भगवान श्रीराम (जो तीन अंक की सीमा में ही रहकर सब कुछ कर गए) के बाद दूसरे एकमात्र सशरीर परमब्रह्म हुए। और दोनों विष्णु अवतार होते हुए इस विष्णु की सीमा का विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की अवस्था को सशरीर प्राप्त किये अपने ज्ञान, जप, तप, तपश्या, बलिदान और त्याग (अपने ही जीवन की अभीष्टम प्रिय वस्तु का मानवता हित में त्याग) से। ईसाइयत सामानांतर चलाती है श्रीकृष्ण के और इस्लाम सामानांतर चलता है श्रीराम के और इसप्रकार पांच महाभूत युक्त मानव विचारधारा का आविर्भाव होता है विश्व मानवता में जो चिरन्तर जारी है।

राजा यदु भी चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे पर अपने चन्द्रवंशीय भाइयों द्वारा लगातार उपेक्षित किये जाने से व्यथित हो अपने पाँचों पुत्रों से कहा की मेरा नया वंश चलेगा और तुम सब चंद्रवंशी से एक कदम दूर हो मेरे नाम के वंश को आगे बढ़ाओ गए और इस प्रकार तुम सब पहले यदुवंशीय हो और तुम्हारी आने वाली सभी पीढ़िया यदुवंशी ही होंगे।  यह है इस दुनिया का पांच अंक से लगाव, पर यह पांच अंक का लगाव स्वयं में तीन अंक के लगाव को संरक्षण और समर्थन के लिए हैं, न की आपस में विद्वेष और घृणा फैलाने तथा अनायास एक दूसरे का विरोध करने के लिए हैं। इसी चन्द्रवंश के यदुवंश की एक शाखा, वृष्णि वंश में योगयोगेश्वर जनार्दन श्रीकृष्ण का जन्म हुआ जो दुनिया के आजतक के इतिहास में भगवान श्रीराम (जो तीन अंक की सीमा में ही रहकर सब कुछ कर गए) के बाद दूसरे एकमात्र सशरीर परमब्रह्म हुए। और दोनों विष्णु अवतार होते हुए इस विष्णु की सीमा का विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की अवस्था को सशरीर प्राप्त किये अपने ज्ञान, जप, तप, तपश्या, बलिदान और त्याग (अपने ही जीवन की अभीष्टम प्रिय वस्तु का मानवता हित में त्याग) से। ईसाइयत सामानांतर चलाती है श्रीकृष्ण के और इस्लाम सामानांतर चलता है श्रीराम के और इसप्रकार पांच महाभूत युक्त मानव विचारधारा का आविर्भाव होता है विश्व मानवता में जो चिरन्तर जारी है।    

जिस तरह से जल में डूबने वाले को बचाने के लिए कोई जाता है तो डूबने वाला उसके कंधे पर चढ़ लेता है चाहे बचाने वाला उसे लेकर स्वयं डूब जाय और इस प्रकार दोनों डूब जायेंगे इसकी चिंता उसे न रहते हुए स्वयं को बचने की चिंता ही उसे रहती है उसी प्रकार यह दुनिया अपने पाप से इतनी दब गयी थी विगत 14 वर्षों में की इसको उबारने वाला ही डूबा दिया जाने वाला था, पर लोग क्या करें वह स्वयं विवेक ठहर गया जो पूर्णतः मानव विकाश को रोकते हुए लगभग पूर्ण रूप से ही सबकी जीवन रक्षा भी किया और उनकी उन्नति को अबाधगति से जारी रहने दिया और नवीनतम सृजन, दुनिया के एक छोर के व्यक्ति का दुनिया के अंतिम छोर तक के व्यक्ति का सम्मिलन कराते हुए और महा सामाजिक परिवर्तन भी गिरिधारी बन जारी किया जाते रहने दिया। सम्पूर्ण मानवता को भविष्य में व्यक्तिगत रूप से अपने द्वारा किशी भी तरह का छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया और इस प्रकार भविष्य के कर्मों के प्रति सचेत कर गया लोगों को। दुनिया को यही कस्ट सत्ता रहा की विवेक सब कर ठीक किया पर छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया।

जिस तरह से जल में डूबने वाले को बचाने के लिए कोई जाता है तो डूबने वाला उसके कंधे पर चढ़ लेता है चाहे बचाने वाला उसे लेकर स्वयं डूब जाय और इस प्रकार दोनों डूब जायेंगे इसकी चिंता उसे न रहते हुए स्वयं को बचने की चिंता ही उसे रहती है उसी प्रकार यह दुनिया अपने पाप से इतनी दब गयी थी विगत 14  वर्षों में की इसको उबारने वाला ही डूबा दिया जाने वाला था, पर लोग क्या करें वह स्वयं विवेक ठहर गया जो पूर्णतः मानव विकाश को रोकते हुए लगभग पूर्ण रूप से ही सबकी जीवन रक्षा भी किया और उनकी उन्नति को अबाधगति से जारी रहने दिया और नवीनतम सृजन, दुनिया के एक छोर के व्यक्ति का दुनिया के अंतिम छोर तक के व्यक्ति का सम्मिलन कराते हुए और महा सामाजिक परिवर्तन भी गिरिधारी बन जारी किया जाते रहने दिया। सम्पूर्ण मानवता को भविष्य में व्यक्तिगत रूप से अपने द्वारा किशी भी तरह का छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया और इस प्रकार भविष्य के कर्मों के प्रति सचेत कर गया लोगों को। दुनिया को यही कस्ट सत्ता रहा की विवेक सब कर ठीक किया पर छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया। 

Tuesday, July 28, 2015

भीम की जरूरत विपत्तिकाल और युद्ध काल में पड़ती ही पड़ती है चाहे अन्य किशी काल में ऐसा हो न हो। इसे हर भारतीय एवं विश्व के किशी भी परिदृश्य के हिंसाब में देखा जाए तो यह कथन सत्य ही निकलेगा।

भीम की जरूरत विपत्तिकाल और युद्ध काल में पड़ती ही पड़ती है चाहे अन्य किशी काल में ऐसा हो न हो। इसे हर भारतीय एवं विश्व के किशी भी परिदृश्य के हिंसाब में देखा जाए तो यह कथन सत्य ही निकलेगा।

हांथी को पालने हेतु/नियंत्रण में लाने हेतु पहले जंगली हांथी को एक बहुत बड़े खाई में गिराते हैं और बहुत दिनों तक भूखे हुए उसका बल जब कम हो जाता है तो उसे बाहर निकाल लोहे के रस्से और लोहे के अंकुश/भाले से नियंत्रण में ले मन मुताबिक नचाया जाता है। तो मेरे भद्रजन मै हांथी और घोड़ा नहीं एक विचारवान और व्यवहारिक व्यक्ति हूँ जो कार्य विशेष में व्यस्त था। अतः आप खाई में गिरा हुआ जंगली हांथी या अपने अंकुश और लोहे की रस्सी से नियंत्रित रहने वाला पालतू हांथी समझने की भूल नहीं कीजियेगा कभी। यह तो किशी को गुरु मान गुरु मर्यादा न तोड़ सकने की शक्ल में नियंत्रित रहता था। गुरुदक्षिणा पूर्ण हो चुकी है उसी नियंत्रण में एक समय विशेस तक रहते रहते पर अब वह स्थिति नहीं रही और न वह गुरु वह गुरु रहा।

हांथी को पालने हेतु/नियंत्रण में लाने हेतु पहले जंगली हांथी को एक बहुत बड़े खाई में गिराते हैं और बहुत दिनों तक भूखे हुए उसका बल जब कम हो जाता है तो उसे बाहर निकाल लोहे के रस्से और लोहे के अंकुश/भाले से नियंत्रण में ले मन मुताबिक नचाया जाता है। तो मेरे भद्रजन मै हांथी और घोड़ा नहीं एक विचारवान और व्यवहारिक व्यक्ति हूँ  जो कार्य विशेष में व्यस्त था।  अतः आप खाई में गिरा हुआ जंगली हांथी या अपने अंकुश और लोहे की रस्सी से नियंत्रित रहने वाला पालतू हांथी समझने की भूल नहीं कीजियेगा कभी। यह तो किशी को गुरु मान गुरु मर्यादा न तोड़ सकने की शक्ल में नियंत्रित रहता था। गुरुदक्षिणा पूर्ण हो चुकी है उसी नियंत्रण में एक समय विशेस तक रहते रहते पर अब वह स्थिति नहीं रही और न वह गुरु वह गुरु रहा।    

मैंने अपने ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition " और आचरण से किशी भी धर्म का विरोध नहीं किया वरन इतना सन्देश जरूर दिया है की कोई बौद्धिस्ट अगर गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण से ऊपर कभी नहीं हो सकता तो कोई इस्लाम अनुयायी या ईसाइयत अनुयायी अपने संगत किशी कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण कि संतान से ऊपर कैसे हो सकता है? और इसलिए सनातन हिन्दू धर्म का क्षरण होना इस्लाम, ईसाइयत बौद्धिस्ट समेत अन्य सभी जाती और पंथ के क्षरण होने का रास्ता साफ करेगा। पूरी दुनिया पर तो ईसाइयत, इस्लाम और बौद्धिस्ट का शासन है और उसे समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय वे नहीं बना पा रहे हैं तो भारत में उनके अनुयायी बहुमत में आ गए तो क्या उनके पास जादू की छड़ी आ जाएगी की उसे घुमा दिया और सभी भारतीय जनता समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय हो जाएगी। अतः जितना अपने हाँथ में है पहले उसे ठीक से सम्भालना शीखना चाहिए तथा अंटार्कटिक संधि की तरह कोई वायरस समाज में नहीं छोड़ना चाहिए जो विदेश में भी जा छती पहुंचाए पर नहीं, आप ऐसा जीवन जी रहे हैं जो भारतीय संस्कृति दूर से ही नहीं बर्दास्त कर पा रही थी पर आप उस संस्कृति को नजदीक ले आ गए लेकिन जब आप भारतीय संस्कृति अपने यहां इसके बदले कुछ हद तक भी नहीं अपनाये तो संतुलन कैसे बनेगा और इस प्रकार इस विश्व का क्या होगा जब संयम इस देश के विशिस्ट जनो और सज्जनों का भी जबाब दे जाएगा? अतः भारत में जितने लोग आप के पंथ का स्वेक्षा से अनुसरण करें या कर रहे हैं उसी पर सीमित रहिये मैंने सबकी कारगुजारी और पौरुस देख लिया है और यह भी पता हो गया है की करिश्मा जो सनातन हिन्दू धर्म के बजरंगबली और भारतीय त्रिदेव और त्रिदेवियों से नहीं हो पाता उसे आप आप के देवजन कैसे करवा लेते हैं? मूर्खों को समझा सकते है आप लोग अच्छी तरीके से पर विवेक(जो सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणो का पुत्र और सनातन गौतम ब्राह्मणों का नाती हो) को नहीं समझा सकते है और इसी लिए बोला हूँ की बाप से होसियारी नहीं चलती है सभी सनातन हिन्दू/ब्राह्मण झुक गए हो पर मुझे नहीं झुकना था आप लोगों के सामने पूरे विश्व को सनातन हिन्दू की संतान बताना ही था और रही बात सभी नए पंथों और धर्मों की तो वे विचार और द्वन्द विश्व के केंद्र प्रयागराज में ही रहे जो अनुकूल स्थान पा यरूसलेम में प्रस्फुटित हो इस्लाम और तदुपरांत ईसाइयत का प्रादुर्भाव हुआ। जिन्होंने क्रमसः संतान हिन्दू धर्मावलम्बियों के कमजोर पड़ने पर पुनः भारत के इस केंद्र तक अपनी पहुँच स्थापित करते हुए पूरे विश्व के सभी जाती/धर्म/पंथ को प्रयागराज से जोड़ा और प्रयागराज को विश्व का केंद्र माना। वैसे भी भारतीय सप्तर्षि परिपाटी में सप्तर्षि/सात ब्रह्मर्षि जिनसे मानव जाती का सृजन हुआ वे प्रयागराज में ही सप्तर्षि हेतु ब्रह्मा द्वारा आयोजित प्रकृष्टा यज्ञ जो विश्व का प्राचीनतम यज्ञ है से जनित माने जाते हैं और इस लिए भी इसे प्रयाग या प्रयागराज कहते हैं।

मैंने अपने ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition " और आचरण से किशी भी धर्म का विरोध नहीं किया वरन इतना सन्देश जरूर दिया है की कोई बौद्धिस्ट अगर गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण से ऊपर कभी नहीं हो सकता तो कोई इस्लाम अनुयायी या ईसाइयत अनुयायी अपने संगत किशी कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण कि संतान से ऊपर कैसे हो सकता है? और इसलिए सनातन हिन्दू धर्म का क्षरण होना इस्लाम, ईसाइयत बौद्धिस्ट समेत अन्य सभी जाती और पंथ के क्षरण होने का रास्ता साफ करेगा। पूरी दुनिया पर तो ईसाइयत, इस्लाम और बौद्धिस्ट का शासन है और उसे समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय वे नहीं बना पा रहे हैं तो भारत में उनके अनुयायी बहुमत में आ गए तो क्या उनके पास जादू की छड़ी आ जाएगी की उसे घुमा दिया और सभी भारतीय जनता  समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय हो जाएगी।  अतः जितना अपने हाँथ में है पहले उसे ठीक से सम्भालना शीखना चाहिए तथा अंटार्कटिक संधि की तरह कोई वायरस समाज में नहीं छोड़ना चाहिए जो विदेश में भी जा छती पहुंचाए पर नहीं, आप ऐसा जीवन जी रहे हैं जो भारतीय संस्कृति दूर से ही नहीं बर्दास्त कर पा रही थी पर आप उस संस्कृति को नजदीक ले आ गए लेकिन जब आप भारतीय संस्कृति अपने यहां इसके बदले कुछ हद तक भी नहीं अपनाये तो संतुलन कैसे बनेगा और इस प्रकार इस विश्व का क्या होगा जब संयम इस देश के विशिस्ट जनो और सज्जनों का भी जबाब दे जाएगा? अतः भारत में जितने लोग आप के पंथ का स्वेक्षा से अनुसरण करें या कर रहे हैं उसी पर सीमित रहिये मैंने सबकी कारगुजारी और पौरुस देख लिया है और यह भी पता हो गया है की करिश्मा जो सनातन हिन्दू धर्म के बजरंगबली और भारतीय त्रिदेव और त्रिदेवियों से नहीं हो पाता उसे आप आप के देवजन कैसे करवा लेते हैं? मूर्खों को समझा सकते है आप लोग अच्छी तरीके से पर विवेक(जो सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणो का पुत्र और सनातन गौतम ब्राह्मणों का नाती हो) को नहीं समझा सकते है और इसी लिए बोला हूँ की बाप से होसियारी नहीं चलती है सभी सनातन हिन्दू/ब्राह्मण झुक गए हो पर मुझे नहीं झुकना था आप लोगों के सामने पूरे विश्व को सनातन हिन्दू की संतान बताना ही था और रही बात सभी नए पंथों और धर्मों की तो वे विचार और द्वन्द विश्व के केंद्र प्रयागराज में ही रहे जो अनुकूल स्थान पा यरूसलेम में प्रस्फुटित हो इस्लाम और तदुपरांत ईसाइयत का प्रादुर्भाव हुआ। जिन्होंने क्रमसः संतान हिन्दू धर्मावलम्बियों के कमजोर पड़ने पर पुनः भारत के इस केंद्र तक अपनी पहुँच स्थापित करते हुए पूरे विश्व के सभी जाती/धर्म/पंथ को प्रयागराज से जोड़ा और प्रयागराज को विश्व का केंद्र माना। वैसे भी भारतीय सप्तर्षि परिपाटी में सप्तर्षि/सात ब्रह्मर्षि जिनसे मानव जाती का सृजन हुआ वे प्रयागराज में ही सप्तर्षि हेतु ब्रह्मा द्वारा आयोजित प्रकृष्टा यज्ञ जो विश्व का प्राचीनतम यज्ञ है से जनित माने जाते हैं और इस लिए भी इसे प्रयाग या प्रयागराज कहते हैं। मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।