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Wednesday, October 1, 2014

भारतीय जान मानस के तीन सबसे महत्वपूर्ण पर्व १) श्रीरामनवमी, २) विजय दशमी और ३) श्रीकृष्ण जन्मास्टमी। और उस श्रीराम और श्री कृष्ण के लिए उनके आराध्य मतलब ईस्ट देव, महादेव शिव-शंकर का स्थान:-"शिव द्रोही मम भक्त कहावा, सोई नर मोहि सपनेहु नहीं पावा।।" और उसी आराध्या शिव के लिए श्रीराम/कृष्ण भी आराध्य मतलब ईस्ट देव है यह कैसी पुनरावृत्ति है इसे संसार स्वयं नहीं जान सका। फिर भी पुण्डरीकाक्ष (कमल:पुण्डरीक नयन:अक्ष:नेत्र:) श्रीराम जब माता दुर्गा को कमल का फूल अचानक थाली में से गायब होने की स्थिति में पूजा-वन्दना के समय अपनी आँख ही चढ़ा देते हैं पूजा की वेदी पर तभी वे रावण के भौतिक शरीर का उद्धार करने की क्षमता हानशील करते हैं और यह प्रमाणित होता है की जीवन सिर के बलिदान से आँखों का बलिदान ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ((रावण भगवान भोले नाथ को सर का बलिदान देता था एयर भगवान श्रीराम ने मान दुर्गा(पारवती ) को अपनी आँख ही चढ़ा दी जिससे माँ उनकी भक्ति से संतुस्ट हो तुरंत वापस लौटा दिया। वह सशरीर जीवन और कसटकर होता है जिसमे आँखें ही न हो और ऐसे में कमल के फूल का संकल्प जो श्रीराम ने किया था उसकी अनुपस्थिति में अपने बाण से आँख निकालकर दान कर दिए थे पूजा की वेदी पर और तब अष्टभुजा माँ दुर्गा (पारवती) प्रकट हो दर्शन दीं भगवान श्री राम को और विजयी भव का आशीर्वाद दिया था))।

भारतीय जान मानस के तीन सबसे महत्वपूर्ण पर्व १) श्रीरामनवमी, २) विजय दशमी और ३) श्रीकृष्ण जन्मास्टमी। और उस श्रीराम और श्री कृष्ण के लिए उनके आराध्य मतलब ईस्ट देव, महादेव शिव-शंकर का स्थान:-"शिव द्रोही मम भक्त कहावा, सोई नर मोहि सपनेहु नहीं पावा।।" और उसी आराध्या शिव के लिए श्रीराम/कृष्ण भी आराध्य मतलब ईस्ट देव है यह कैसी पुनरावृत्ति है इसे संसार स्वयं नहीं जान सका। फिर भी पुण्डरीकाक्ष (कमल:पुण्डरीक नयन:अक्ष:नेत्र:) श्रीराम जब माता दुर्गा को कमल का फूल अचानक थाली में से गायब होने की स्थिति में पूजा-वन्दना के समय अपनी आँख ही चढ़ा देते हैं पूजा की वेदी पर तभी वे रावण के भौतिक शरीर का उद्धार करने की क्षमता हानशील करते हैं और यह प्रमाणित होता है की जीवन सिर के बलिदान से आँखों का बलिदान ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ((रावण भगवान भोले नाथ को सर का बलिदान देता था एयर भगवान श्रीराम ने मान दुर्गा(पारवती ) को अपनी आँख ही चढ़ा दी जिससे माँ उनकी भक्ति से संतुस्ट हो तुरंत वापस लौटा दिया। वह सशरीर जीवन और कसटकर होता है जिसमे आँखें ही न हो और ऐसे में कमल के फूल का संकल्प जो श्रीराम ने किया था उसकी अनुपस्थिति में अपने बाण से आँख निकालकर दान कर दिए थे पूजा की वेदी पर और तब अष्टभुजा माँ दुर्गा (पारवती) प्रकट हो दर्शन दीं भगवान श्री राम को और विजयी भव का आशीर्वाद दिया था))।

Kedareswar, MahaMritunjay and Vishveshwar as three part of the Shiva’s Trishul power in connection with Lord Vishwanath who were given base to ground of Kashi i.e. the Varanasi thus Kashi is the 'original ground' created by Lord Shiva and Parvati, upon which they stood at the beginning of human time. Lord Kedareswar is known as Aadi-Shankar:Aadyaashankar thus the Lord of Supreme Sacrifices.

Kedareswar, MahaMritunjay and Vishveshwar as three part of the Shiva’s Trishul power in connection with Lord Vishwanath who were given base to ground of Kashi i.e. the Varanasi thus Kashi is the 'original ground' created by Lord Shiva and Parvati, upon which they stood at the beginning of human time. Lord Kedareswar is known as Aadi-Shankar:Aadyaashankar thus the Lord of Supreme Sacrifices.

Monday, September 29, 2014

Navratri

1. शैलपुत्री:- नवरात्र पर्व (Navratri Festival) के प्रथम दिन को शैलपुत्री नामक देवी की आराधना की जाती है. पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि हिमालय के तप से प्रसन्न होकर आद्या शक्ति उनके यहां पुत्री के रूप में अवतरित हुई और इनके पूजन के साथ नवरात्र का शुभारंभ होता है.
ध्यान मंत्र
वंदे वांच्छितलाभायाचंद्रार्धकृतशेखराम्.
वृषारूढांशूलधरांशैलपुत्रीयशस्विनीम्॥
पूणेंदुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा.
पटांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिता॥
प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्.
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्॥
स्तोत्र मंत्र
प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम्.
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम्.
सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन.
भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन.
भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
कवच मंत्र
ओमकार:में शिर: पातुमूलाधार निवासिनी.
हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरी॥
श्रीकार:पातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी.
हूंकार:पातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृत॥
फट्कार:पातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा.
2. ब्रह्मचारिणी:- भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती की कठिन तपस्या से तीनों लोक उनके समक्ष नतमस्तक हो गए. देवी का यह रूप तपस्या के तेज से ज्योतिर्मय है. इनके दाहिने हाथ में मंत्र जपने की माला तथा बाएं में कमंडल है.
ध्यान मंत्र
वन्दे वांच्छितलाभायचन्द्रर्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलुधराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णास्वाधिष्ठानास्थितांद्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधानांब्रह्मरूपांपुष्पालंकारभूषिताम्॥
पद्मवंदनापल्लवाराधराकातंकपोलांपीन पयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीनिम्न नाभि नितम्बनीम्॥
स्तोत्र मंत्र
तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।
ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
नवचक्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।
धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्।
कवच मंत्र
त्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।
अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलो॥
पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरी॥
षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातुब्रह्मचारिणी॥
3. चन्द्रघंटा :- शक्ति के इस स्वरूप की उपासना तीसरे दिन की जाती है. देवी के मस्तक में घंटाकार चंद्रमा होता है. इससे सांसारिक बाधाओं से मुक्ति मिलती है. पूजन व ध्यान का समय सूर्योदय से पूर्व का है जो भक्त नवरात्रि में 4 वर्ष की सुन्दर निरोगी कन्या का पूजन करता है उसे शीघ्र फल की प्राप्ति होती है. इस साधना के लिये निम्न मंत्र है-
पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥
4. कूष्मांडा :- नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्मांडा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है. इस दिन साधक का मन ‘अदाहत’ चक्र में अवस्थित होता है. अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्मांडा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए. मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए निम्न मंत्र को कंठस्थ कर नवरात्रि में चतुर्थ दिन इसका जाप करना चाहिए :
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
5. स्कंदमाता :- शक्ति के इस स्वरूप की उपासना पांचवे दिन की जाती है . देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कन्द की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता के नाम से जानते हैं. यह शक्ति वा सुख का एहसास कराती हैं . नवरात्रि में पांचवें दिन मंत्र का जाप करना चाहिए:
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी ॥
6. कात्यायिनी :- महर्षि कात्यान के कठोर के बाद देवी ने पुत्री स्वरूप जन्म लिया और कत्यायिनी नाम से जानी गई . इस शक्ति की उपासना से मोछ की प्राप्ति हो जाती है. इस दिन मां के इस मंत्र का जाप उपयोगी होगा :
चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दघाद्देवी दानवघातिनी ॥
जिन कन्याओं के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो,उन्हे इस दिन मां कात्यायिनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हें मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है.
7. कालरात्रि :- मां दुर्गा की सातवी शक्ति कालरात्रि तीन आखें , बिखरे बाल , कृष्ण वर्ण , विकराल स्वरूप में हैं. इस देवी की उपासना से समस्त पापों का नाश होता है और मां हमें भय-मुक्त कर के अनंत पुण्यफल का आशीष प्रदान करती है. इस दिन निम्न मंत्र का जाप करें:
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।
लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥
8. महागौरी :- आठवें दिन मां के महागौरी रुप की उपासना की जाती है . इसकी उपासना से पूर्व में किए हुए पापों का नाश होता है और साथ ही भविष्य को सफलता का आर्शीवाद प्राप्त होता है. इस दिन निम्न मंत्र का जाप करें:
श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः ।
महागौरी शुभं दघान्महादेवप्रमोददा ॥
9. सिद्धिदात्री :- नवरात्री का अंतिम व सबसे अहम दिन क्योकि यह माता की नो विभूति है. सभी प्रकार की सिद्धि देने वाली और इस शक्ति की उपासना से सभी प्रकार की समस्त सिद्धिया प्राप्त होती है और कोई मनोकामना शेष नहीं रहती है. इस दिन निम्न मंत्र का जाप करें:
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात्‌ सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥

Saturday, September 27, 2014

कश्यप गोत्रीय सरयूपारीण सनातन ब्राह्मण(Eternal Brahmin) त्रिफला(विल्वा पत्र :बेलपत्र:त्रिफला पत्र) पाण्डेय विवेक कुमार: देवी ब्रह्मचारिणी: ------विल्वा पत्र (बेल पत्र:त्रिफला पत्र) जिसे भोजन के रूप में प्रयोग करती थीं तपस्वी: ब्रह्मचारिणी के रूप में उसका भी त्याग कर अपर्णा कहलाई थी और इस व्रत को त्यागने के लिए माँ मैना द्वारा उच्चारित शब्द उमा होने से इनका एक नाम उमा (मतलब शिव को अपने पति के रूप में पाने हेतु करने वाले इस कठोर व्रत/तपस्या का त्याग भी अब कर दो ना) भी है।---- दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तम|| भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया। मांदुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं। पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

कश्यप गोत्रीय सरयूपारीण सनातन ब्राह्मण(Eternal Brahmin) त्रिफला(विल्वा पत्र :बेलपत्र:त्रिफला पत्र) पाण्डेय विवेक कुमार: देवी ब्रह्मचारिणी: ------विल्वा पत्र (बेल पत्र:त्रिफला पत्र) जिसे भोजन के रूप में प्रयोग करती थीं तपस्वी: ब्रह्मचारिणी के रूप में उसका भी त्याग कर अपर्णा कहलाई थी और इस व्रत को त्यागने के लिए माँ मैना द्वारा उच्चारित शब्द उमा होने से इनका एक नाम उमा (मतलब शिव को अपने पति के रूप में पाने हेतु करने वाले इस कठोर व्रत/तपस्या का त्याग भी अब कर दो ना) भी है।----
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तम||
भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया।
मांदुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं।
पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।
कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।
कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।
मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

एक देवकीनन्दन वाशुदेव कृष्ण जो वृष्टिवंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय वशुदेव के पुत्र थे और विष्णु के अवतार होते हुए सशरीर परमब्रह्म का पद प्राप्त किये भगवान श्री राम की तरह वही दूसरे थे परमसती सती अनुसूइयानन्दन आत्रेय कृष्ण (कृष्णात्रेय:दुर्वाशा) जो सप्तर्षि में से एक सनातन ऋषि अत्रि के पुत्र थे और जो अपनी माता सतीइस्ट अनुसुइया के सतीत्व की त्रिदेव:ब्रह्मा+विष्णु+महेश ((त्रिदेवी/त्रिसती द्वारा ऐसा करने के लिए मजबूर किये जाने से परिक्षा ली की त्रिदेवी/त्रिसती(सरस्वती+लक्ष्मी+गौरा पारवती) से ज्यादा बड़ी सती स्वयं सती अनुसुइया हो गयी हैं वास्तविक रूप से या यह एक लोककथा ही है)) द्वारा ली गयी परिक्षा में सफल होने पर स्वयं त्रिदेव द्वारा अपने तीनो (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की पूरी शक्ति के बराबर तेज का तेजस्वी पुत्र के वरदान स्वरुप परमब्रह्म के सामान तेज प्राप्त किये थे। पर दुर्वाशा स्वयं परमब्रह्म तो नहीं हो सके भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की तरह किन्तु सशरीर परमब्रह्म शक्ति और तेज उनको हांसिल है और यही कारन है की जब श्री राम और श्री कृष्ण ने विष्णु अवतार से आगे बढ़ाते हुए सशरीर परमब्रह्म का सर्व-आकांशी पद प्राप्त किया तो यही दुर्वाशा:कृष्णात्रेय जो अत्रि और अनुसुइया के पुत्र थे वे इन दोनों एक मात्र सशरीर परमब्रह्म को पुनः विष्णुलोक:वैकुण्ठलोक :क्षीर-सागर वापस भेजने के करक उसी तरह हो गए जिस तरह से उनके आशीर्वाद से जन्म लिए कर्ण की मृत्यु का कारक स्वयं वाशुदेव कृष्ण बने थे जो वशुदेव और देवकी के पुत्र थे।

एक देवकीनन्दन वाशुदेव कृष्ण जो वृष्टिवंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय वशुदेव के पुत्र थे और विष्णु के अवतार होते हुए सशरीर परमब्रह्म का पद प्राप्त किये भगवान श्री राम की तरह वही दूसरे थे परमसती सती अनुसूइयानन्दन आत्रेय कृष्ण (कृष्णात्रेय:दुर्वाशा) जो सप्तर्षि में से एक सनातन ऋषि अत्रि के पुत्र थे और जो अपनी माता सतीइस्ट अनुसुइया के सतीत्व की त्रिदेव:ब्रह्मा+विष्णु+महेश ((त्रिदेवी/त्रिसती द्वारा ऐसा करने के लिए मजबूर किये जाने से परिक्षा ली की त्रिदेवी/त्रिसती(सरस्वती+लक्ष्मी+गौरा पारवती) से ज्यादा बड़ी सती स्वयं सती अनुसुइया हो गयी हैं वास्तविक रूप से या यह एक लोककथा ही है)) द्वारा ली गयी परिक्षा में सफल होने पर स्वयं त्रिदेव द्वारा अपने तीनो (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की पूरी शक्ति के बराबर तेज का तेजस्वी पुत्र के वरदान स्वरुप परमब्रह्म के सामान तेज प्राप्त किये थे। पर दुर्वाशा स्वयं परमब्रह्म तो नहीं हो सके भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की तरह किन्तु सशरीर परमब्रह्म शक्ति और तेज उनको हांसिल है और यही कारन है की जब श्री राम और श्री कृष्ण ने विष्णु अवतार से आगे बढ़ाते हुए सशरीर परमब्रह्म का सर्व-आकांशी पद प्राप्त किया तो यही दुर्वाशा:कृष्णात्रेय जो अत्रि और अनुसुइया के पुत्र थे वे इन दोनों एक मात्र सशरीर परमब्रह्म को पुनः विष्णुलोक:वैकुण्ठलोक :क्षीर-सागर वापस भेजने के करक उसी तरह हो गए जिस तरह से उनके आशीर्वाद से जन्म लिए कर्ण की मृत्यु का कारक स्वयं वाशुदेव कृष्ण बने थे जो वशुदेव और देवकी के पुत्र थे।   

Friday, September 26, 2014

कश्यप गोत्रीय सरयूपारीण सनातन ब्राह्मण(Eternal Brahmin) त्रिफला(विल्वा पत्र :बेलपत्र:त्रिफला पत्र) पाण्डेय विवेक कुमार:-------देवी ब्रह्मचारिणी: -----------विल्वा पत्र (बेल पत्र:त्रिफला पत्र) जिसे भोजन के रूप में प्रयोग करती थीं तपस्वी: ब्रह्मचारिणी के रूप में उसका भी त्याग कर अपर्णा कहलाई थी और इस व्रत को त्यागने के लिए माँ मैना द्वारा उच्चारित शब्द उमा होने से इनका एक नाम उमा (मतलब शिव को अपने पति के रूप में पाने हेतु करने वाले इस कठोर व्रत/तपस्या का त्याग भी अब कर दो ना) भी है। दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तम|| भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया। मांदुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं। पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

कश्यप गोत्रीय सरयूपारीण सनातन ब्राह्मण(Eternal Brahmin) त्रिफला(विल्वा पत्र :बेलपत्र:त्रिफला पत्र) पाण्डेय विवेक कुमार:-------देवी ब्रह्मचारिणी: -----------विल्वा पत्र (बेल पत्र:त्रिफला पत्र) जिसे भोजन के रूप में प्रयोग करती थीं तपस्वी: ब्रह्मचारिणी के रूप में उसका भी त्याग कर अपर्णा कहलाई थी और इस व्रत को त्यागने के लिए माँ मैना द्वारा उच्चारित शब्द उमा होने से इनका एक नाम उमा (मतलब शिव को अपने पति के रूप में पाने हेतु करने वाले इस कठोर व्रत/तपस्या का त्याग भी अब कर दो ना) भी है।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तम||
भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया।
मांदुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं।
पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।
कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।
कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।
मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

Thursday, September 25, 2014

Shiv and Sati(Parvati) known as Shiv and Shakti i.e. Purush and Prakriti i.e. Human and Nature :------Lord Brahma is cited in the Markandey Purana as mentioning to Rishi Markandey that the first incarnation of Shakti:Sati was as Shailputri. Further incarnations of the Divine Mother are: Brahmcharñi, Chandraghanta, Kushmanda, Skandamata, Katyayani, Kalratri, Mahagauri and Siddhidatri in that order of Shailputri. These nine manifestations of Shakti, are worshipped as "Nava-Durga". The fifth chapter of the Rudra Sanhita of Shiva Purana also vividly describes the various Divine Emanations of Durga. -----Since the Vedic Age of the Rishies, the devotional practices recommended during Navratri are primarily those of Gayatri Anushthana. ----In the Vedic Age of the Indian Culture, the religious philosophy and devotional practices were focused towards true knowledge and ultimate realization of the supreme power of Gayatri (Bram Shakti). The Vedas were the basis of all streams of spirituality and science those days. Gayatri has been the source of the divine powers of the gods and non-goddesses in the heavens and their angelic manifestations and incarnations. Gayatri sadhana was also paramount in the higher level spiritual endeavors of the yogis and tapaswis. Gayatri Mantra was the core-focus of daily practice of sandhya-vandan (meditation and devotional worship) for everyone. As guided by the rishis, specific sadhanas and upasanas of the Gayatri Mantra were sincerely practiced during the festival period of Navaratri by every aspirant of spiritual enlightenment.

Shiv and Sati(Parvati) known as Shiv and Shakti i.e. Purush and Prakriti i.e. Human and Nature :------Lord Brahma is cited in the Markandey Purana as mentioning to Rishi Markandey that the first incarnation of Shakti:Sati was as Shailputri. Further incarnations of the Divine Mother are: Brahmcharñi, Chandraghanta, Kushmanda, Skandamata, Katyayani, Kalratri, Mahagauri and Siddhidatri in that order of Shailputri. These nine manifestations of Shakti, are worshipped as "Nava-Durga". The fifth chapter of the Rudra Sanhita of Shiva Purana also vividly describes the various Divine Emanations of Durga. -----Since the Vedic Age of the Rishies, the devotional practices recommended during Navratri are primarily those of Gayatri Anushthana. ----In the Vedic Age of the Indian Culture, the religious philosophy and devotional practices were focused towards true knowledge and ultimate realization of the supreme power of Gayatri (Bram Shakti). The Vedas were the basis of all streams of spirituality and science those days. Gayatri has been the source of the divine powers of the gods and non-goddesses in the heavens and their angelic manifestations and incarnations. Gayatri sadhana was also paramount in the higher level spiritual endeavors of the yogis and tapaswis. Gayatri Mantra was the core-focus of daily practice of sandhya-vandan (meditation and devotional worship) for everyone. As guided by the rishis, specific sadhanas and upasanas of the Gayatri Mantra were sincerely practiced during the festival period of Navaratri by every aspirant of spiritual enlightenment.