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Monday, August 18, 2014

NAND Baba ke Kulguru Garg Rishi ne Govind(VAASHUDEV) ko Krishna nam diya aur VASHUDEV ke Kulguru Shandilya gotriy Sandipani Rishi ne Shiksha diya ((Jisame Shandilya swayam Kashyap Rishi kee kul ki kanya aur Vashishth Rishi ke putra the jo Kashmir me Janm liye the; tathaa Garg rishi Bharadwaj Rishi ke shishya the jo Kashyap Gotriy Valmiki(Garg was disciple of Bharadwaj who was disciple of Valmiki/Varun/Kashyap rishi) ki shishya parampara me aate hain. Aur isee Valmiki kaa Bithoor Ashram Sita Van-Gaman ke samay ashray kaa praman liye huye hai jahaan Lav aur Kush janm liye the))|

NAND Baba ke Kulguru Garg Rishi ne Govind(VAASHUDEV) ko Krishna nam diya aur VASHUDEV ke Kulguru Shandilya gotriy Sandipani Rishi ne Shiksha diya ((Jisame Shandilya swayam Kashyap Rishi kee kul ki kanya aur Vashishth Rishi ke putra the jo Kashmir me Janm liye the; tathaa Garg rishi Bharadwaj Rishi ke shishya the jo Kashyap Gotriy Valmiki(Garg was disciple of Bharadwaj who was disciple of Valmiki/Varun/Kashyap rishi) ki shishya parampara me aate hain. Aur isee Valmiki kaa Bithoor Ashram Sita Van-Gaman ke samay ashray kaa praman liye huye hai jahaan Lav aur Kush janm liye the))|

Shiva aur Parvati(Sati:Gauri) ke do putra hai Ganesh:Vivek( has wives Ridhdhi aur Sidhdhi) aur Kartikey: Purusharth jo Shiv ke hee rup hai.

Shiva aur Parvati(Sati:Gauri) ke do putra hai Ganesh:Vivek( has wives Ridhdhi aur Sidhdhi) aur Kartikey: Purusharth jo Shiv ke hee rup hai.

SHIVA:TRINETRA:TRILOCHAN:VIVEK hi jisase rooth gaye ho sansar me use kaun prem aur samman Dega uske sath dhokha aur tiraskar hi hoga: SATI (Parvati) AUR PITA DAKSH PRAJAPATI prakaran jisame Shiv ko naraj kar Sati apane mayka apane pita ke yagya me shamil hone gayee thee jo Shiv ko apamaanit kliyaa karate the aur us yagya me Shiva aur Sati ko bulaaye bhee nahee the.

SHIVA:TRINETRA:TRILOCHAN:VIVEK hi jisase rooth gaye ho sansar me use kaun prem aur samman Dega uske sath dhokha aur tiraskar hi hoga: SATI (Parvati) AUR PITA DAKSH PRAJAPATI prakaran jisame Shiv ko naraj kar Sati apane mayka apane pita ke yagya me shamil hone gayee thee jo Shiv ko apamaanit kliyaa karate the aur us yagya me Shiva aur Sati ko bulaaye bhee nahee the.

Shiva Puran me Mahadev Shiva ne kaha hai ki Shri Ram mere Iswar par Shri Krishna aur mujh me koi antar nahi agar paristhiyan saman hon. Sampoorn Manavata ko saprem Shubh Shri Krishn Janmastami. RADHE-KRISHN/SITA-RAM/RAM-JANKI/SHRI RAM.

Shiva Puran me Mahadev Shiva ne kaha hai ki Shri Ram mere Iswar par Shri Krishna aur mujh me koi antar nahi agar paristhiyan saman hon. Sampoorn Manavata ko saprem Shubh Shri Krishn Janmastami. RADHE-KRISHN/SITA-RAM/RAM-JANKI/SHRI RAM.

Samman pane se jyada kathin hai samman bachana aur samman pana chahte ho bhavishya me to apane se shresth ko samman dena shikho kam se kam. Sarvajanik karyon me risk bhara kadam lena seekho n ki niji swarth aur samman ko hi sarvopari samajhen. Vidammabana yah ki apane se badon ke karya me laghu roda banjaate hain aur garron ki thekedari ka hissa ban jaate hai badon ka kam bigadne me.

Samman pane se jyada kathin hai samman bachana aur samman pana chahte ho bhavishya me to apane se shresth ko samman dena shikho kam se kam. Sarvajanik karyon me risk bhara kadam lena seekho n ki niji swarth aur samman ko hi sarvopari samajhen. Vidammabana yah ki apane se badon ke
karya me laghu roda banjaate hain aur garron ki thekedari ka hissa ban jaate hai badon ka kam bigadne me.

Saturday, August 16, 2014

जिस विवेक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन ने 2001-2002 के समय में ही पूरे प्रयागराज/अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय और प्रयागराज/अल्लाहाबाद की रिपोर्ट तैयार किया हो चित्रगुप्त की तरह और 2003 में अंतरिम रिपोर्ट और विरोध जाता दिया हो यहाँ नामांकन करवाने को लेकर(उस समय की मेरी मेधा पर ध्यान दीजिये मेधा और कुशाग्रता में किशी से कम नहीं था जो स्वयं आत्म हत्या करूँ विना पूर्ण ध्यान दिए सार्वजनिक हित वाले काम में ) पर मेरा कोई अन्य समुचित विकल्प जो नीव की पहली ईंट बन सके बन सके न होने से गुरुजन(ब्रह्मा: जोशी-श्रीवास्तव-पाण्डेय अविनाश; विष्णु:श्रीधर; महेश: पाण्डेय प्रेम मतलब वास्तविक तात्कालिक त्रिदेव:परमब्रह्म) के आदेश स्वरुप स्वयं को यही का बना लिया और शिक्षा के पहले ही गुरुदक्षिणा भी दे दिया इसके परिणाम स्वरुप मेरे ऊपर होने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए जो अवस्य-संभाव था ही वाह्य विरोध को देखते हुए । प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय को विश्व परिवर्तन और नवनिर्माण के महायज्ञ के लिए उचित स्थान चुने जाने की तुलना में काशी को उचित स्थान मैंने पाया था इस कार्यविशेष के लिए जैसा की यह प्रयागराज विश्वविद्यालय एक राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय के स्तर का ही माहौल में था और यहाँ की तत्कालीन व्यापक जन-जन में राजनीती सोच जिसमे की अधिकार ज्यादा और कर्त्तव्य उसके मुकाबले कम माँगा जा रहा था और प्रयाग से दूर के व्यक्ति को काम करके आंका जाता था। अतः मित्रो मैंने रिस्क शोध में भी लिया और सेवा हेतु पद ग्रहण में भी लिया पूर्ण विश्वास के साथ कि कदम आगे बढ़ा रहा हूँ और कार्य अवस्य पूर्ण होगा और इसीलिये यह भी बताना चाहूँगा की 2004 के बाद रिस्क केंद्रीय सरकार के मंत्रालय में संपर्क और पत्र-व्यवहार करके भी लिया हूँ इस विशेष सार्वजनिक हित को पूर्ण करने के लिए जिसे पिछली सरकार का लक्ष्य मानकर बंद किया जा सकता था बिना किशी पूर्ण उपयोगिता के व्याख्या के अभाव में और जिसमे मेरा भी हित समाहित था क्योंकि विना विवेक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन के दुनिया ही मृतक समान है कोई पार्टी मुझसे अछूती ही क्यों यद्यपि मै पार्टी स्तर पर एक विशेष राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का विचार रखता हूँ जो तब सत्ता में नहीं थी और मेरा प्रयास रंग लाया अन्य-गण्यमान महानुभावों के प्रयास में शामिल हो और इस विश्वविद्यालय में आज एक शिक्षक भी हूँ इसका ही एक शोधछात्र होकर।-------------Now report on myself is being prepared by whom?

जिस विवेक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन ने 2001-2002 के समय में ही पूरे प्रयागराज/अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय और प्रयागराज/अल्लाहाबाद की रिपोर्ट तैयार किया हो चित्रगुप्त की तरह और 2003 में अंतरिम रिपोर्ट और विरोध जाता दिया हो यहाँ नामांकन करवाने को लेकर(उस समय की मेरी मेधा पर ध्यान दीजिये मेधा और कुशाग्रता में किशी से कम नहीं था जो स्वयं आत्म हत्या करूँ विना पूर्ण ध्यान दिए सार्वजनिक हित वाले काम में ) पर मेरा कोई अन्य समुचित विकल्प जो नीव की पहली ईंट बन सके बन सके न होने से गुरुजन(ब्रह्मा: जोशी-श्रीवास्तव-पाण्डेय अविनाश; विष्णु:श्रीधर; महेश: पाण्डेय प्रेम मतलब वास्तविक तात्कालिक त्रिदेव:परमब्रह्म) के आदेश स्वरुप स्वयं को यही का बना लिया और शिक्षा के पहले ही गुरुदक्षिणा भी दे दिया इसके परिणाम स्वरुप मेरे ऊपर होने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए जो अवस्य-संभाव था ही वाह्य विरोध को देखते हुए । प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय को विश्व परिवर्तन और नवनिर्माण के महायज्ञ के लिए उचित स्थान चुने जाने की तुलना में काशी को उचित स्थान मैंने पाया था इस कार्यविशेष के लिए जैसा की यह प्रयागराज विश्वविद्यालय एक राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय के स्तर का ही माहौल में था और यहाँ की तत्कालीन व्यापक जन-जन में राजनीती सोच जिसमे की अधिकार ज्यादा और कर्त्तव्य उसके मुकाबले कम माँगा जा रहा था और प्रयाग से दूर के व्यक्ति को काम करके आंका जाता था। अतः मित्रो मैंने रिस्क शोध में भी लिया और सेवा हेतु पद ग्रहण में भी लिया पूर्ण विश्वास के साथ कि कदम आगे बढ़ा रहा हूँ और कार्य अवस्य पूर्ण होगा और इसीलिये यह भी बताना चाहूँगा की 2004 के बाद रिस्क केंद्रीय सरकार के मंत्रालय में संपर्क और पत्र-व्यवहार करके भी लिया हूँ इस विशेष सार्वजनिक हित को पूर्ण करने के लिए जिसे पिछली सरकार का लक्ष्य मानकर बंद किया जा सकता था बिना किशी पूर्ण उपयोगिता के व्याख्या के अभाव में और जिसमे मेरा भी हित समाहित था क्योंकि विना विवेक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन के दुनिया ही मृतक समान है कोई पार्टी मुझसे अछूती ही क्यों यद्यपि मै पार्टी स्तर पर एक विशेष राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का विचार रखता हूँ जो तब सत्ता में नहीं थी और मेरा प्रयास रंग लाया अन्य-गण्यमान महानुभावों के प्रयास में शामिल हो और इस विश्वविद्यालय में आज एक शिक्षक भी हूँ इसका ही एक शोधछात्र होकर।-------------Now report on myself is being prepared by whom?