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Thursday, May 28, 2015

श्रीराम और श्रीकृष्ण की तरह समय और नियम के पुजारी होने का भाव ही हमें न्यायालय की चौखट पर ले गया अन्यथा मई अपना न्याय स्वयं करता हूँ उससे मुझे कोई रोक नहीं सकता है इस विश्व में: जिस श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।

श्रीराम और श्रीकृष्ण की तरह समय और नियम के पुजारी होने का भाव ही हमें न्यायालय की चौखट पर ले गया अन्यथा मई अपना न्याय स्वयं करता हूँ उससे मुझे कोई रोक नहीं सकता है इस विश्व में: जिस श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।

किशी की तवहीनी करना कोई प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुछ समूह विशेष के लोगों से शीखे जो वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ करने करने के धंधे में लिप्त है उचित पद प्राप्त होने पर स्पस्ट रूप से परिभाषित नियम और पर्याप्त सामन्तराल पर पद ग्रहण तिथि होने के बावजूद। ये रामनगर, जौनपुर के है या रावणनगर, लंका के, भानुप्रताप हैं या राजा प्रतापभानु(रावण के पिता); हरिश्चंद पुत्र रोहितस्व के वंसज हैं या रावण के गण छलिया और झूंठ-प्रपंच का स्वामी कालनेमि।

किशी की तवहीनी करना कोई प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुछ समूह विशेष के लोगों से शीखे जो वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ करने करने के धंधे में लिप्त है उचित पद प्राप्त होने पर स्पस्ट रूप से परिभाषित नियम और पर्याप्त सामन्तराल पर पद ग्रहण तिथि होने के बावजूद। ये रामनगर, जौनपुर के है या रावणनगर, लंका के, भानुप्रताप हैं या राजा प्रतापभानु(रावण के पिता); हरिश्चंद पुत्र रोहितस्व के वंसज हैं या रावण के गण छलिया और झूंठ-प्रपंच का स्वामी कालनेमि।

Wednesday, May 27, 2015

जिस श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।



जिस  श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।

वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है। >>>>>>>जोशी-अटल बहुत चिल्लाते हो तो ये बताओ उनके लिए क्या कर सकते हो? जीते जी जलना स्वीकार कर जलाये जाने पर तड़पड़ाउंगा भी नहीं और शरीर में हर जगह कील ठोंक दी जाय तो भी विचलित नहीं होऊंगा, मान-सम्मान-स्वाभिमान सब दांव पर लगा सकता हूँ उनके किशी भी उद्देश्य की पूर्ती हेतु और इस हेतु किशी की दासता करनी हो तो भी स्वीकार है। भारतरत्न मिले न मिले अटल को रामरत्न और जोशी को कृष्णरत्न मै स्वयं दूंगा।-----यह थी महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक की श्रीराम(अटल)/कृष्ण(जोशी) भक्ति। और महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक को जो भी कुछ मिला वह थी श्रीराम/कृष्ण की महादेव की भक्ति तो उन दोनों के जीते जी श्रीराम(विष्णुकांत)/कृष्ण(कृष्णकांत) महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक के घर आ गए हैं और हो भी क्यों न जब कुछ नेता अपने जीते जी अपनी मूर्तिया बनवा लेते है तो श्रीराम/कृष्ण अपना प्रतिरूप क्यों नहीं देख सकते अपने जीते जी। फिर से बता देता हूँ की विष्णु अवतार को मात्र दो बार सशरीर परमब्रह्म बनना पड़ा था श्रीराम और श्री कृष्ण के रूप में तो इस बार महादेव ही सशरीर परमब्रह्म बन गए थे विश्व महाविनाश की महाविभीषिका को नियंत्रित करने हेतु।-----वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है।

वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है। >>>>>>>जोशी-अटल बहुत चिल्लाते हो तो ये बताओ उनके लिए क्या कर सकते हो? जीते जी जलना स्वीकार कर जलाये जाने पर तड़पड़ाउंगा भी नहीं और शरीर में हर जगह कील ठोंक दी जाय तो भी विचलित नहीं होऊंगा, मान-सम्मान-स्वाभिमान सब दांव पर लगा सकता हूँ उनके किशी भी उद्देश्य की पूर्ती हेतु और इस हेतु किशी की दासता करनी हो तो भी स्वीकार है। भारतरत्न मिले न मिले अटल को रामरत्न और जोशी को कृष्णरत्न मै स्वयं दूंगा।-----यह थी महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक की श्रीराम(अटल)/कृष्ण(जोशी) भक्ति। और महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक को जो भी कुछ मिला वह थी श्रीराम/कृष्ण की महादेव की भक्ति तो उन दोनों के जीते जी श्रीराम(विष्णुकांत)/कृष्ण(कृष्णकांत) महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक के घर आ गए हैं और हो भी क्यों न जब कुछ नेता अपने जीते जी अपनी मूर्तिया बनवा लेते है तो श्रीराम/कृष्ण अपना प्रतिरूप क्यों नहीं देख सकते अपने जीते जी। फिर से बता देता हूँ की विष्णु अवतार को मात्र दो बार सशरीर परमब्रह्म बनना पड़ा था श्रीराम और श्री कृष्ण के रूप में तो इस बार महादेव ही सशरीर परमब्रह्म बन गए थे विश्व महाविनाश की महाविभीषिका को नियंत्रित करने हेतु।-----वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है।

महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।

महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।

त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति:---चन्द्रदेव/चाँद को तारे/सूर्यदेव की जरूरत होती है यह सत्य है पर सूर्यदेव को भी चाँद की जरूरत होती है? उत्तर है नहीं? फिर भी क्या सम्बन्ध है की दोनों की समान महत्ता प्रति पादित की जाती है मानव इतिहास में? उत्तर है मानवता की रक्षा हेतु पृथ्वी पर दोनों की महत्ता है। कारन की जो मानव हित की क्रियाएँ केवल रात में चाँद के रहने पर प्रकृति प्रतिपादित करती है वह दिन में सूर्य के रहते नही हो सकती है तो दोनों में से किशी एक के अभाव में मानव जीवन असंतुलित हो सकता है। अतः जिस तारे/सूर्यदेव को चन्द्रदेव/चन्दा की जरूरत नहीं भी है वह सूर्य को जीवन का मूलभूत आधार कहवाने हेतु चन्द्रदेव/चाँद पर निर्भर रहना पड़ता है मानवता के हिट में। --लेकिन मानव समाज में कश्यप ऋषि के दोनों वंसजों सूर्यदेव और चन्द्रदेव की बात आती है तो दोनों कश्यप ऋषि और उनकी दूसरी पत्नी अदिति के पुत्र आदित्य के पुत्र हुए जो सूर्य और चन्द्रमा के समान गुण रखते हैं और एक मानव के रूप में ही वे सूर्यदेव और चन्द्रदेव की ही तरह तेजमय और मृदुल और मनोहारी गुण से समाज को प्रभावित करते हैं और समान ऊर्जा के स्वामी है।--------विवेक पुत्र प्रदीप(सूर्य की ऊर्जा का भी स्वयं में आतंरिक मुख्य स्रोत)/सूर्यकांत। हुआ न स्वयं सूर्यदेव/ सूर्यकांत(सूर्य के स्वामी) का पुत्र । त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति----महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।

त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति:---चन्द्रदेव/चाँद को तारे/सूर्यदेव की जरूरत होती है यह सत्य है पर सूर्यदेव को भी चाँद की जरूरत होती है? उत्तर है नहीं? फिर भी क्या सम्बन्ध है की दोनों की समान महत्ता प्रति पादित की जाती है मानव इतिहास में? उत्तर है मानवता की रक्षा हेतु पृथ्वी पर दोनों की महत्ता है। कारन की जो मानव हित की क्रियाएँ केवल रात में चाँद के रहने पर प्रकृति प्रतिपादित करती है वह दिन में सूर्य के रहते नही हो सकती है तो दोनों में से किशी एक के अभाव में मानव जीवन असंतुलित हो सकता है। अतः जिस तारे/सूर्यदेव को चन्द्रदेव/चन्दा की जरूरत नहीं भी है वह सूर्य को जीवन का मूलभूत आधार कहवाने हेतु चन्द्रदेव/चाँद पर निर्भर रहना पड़ता है मानवता के हिट में। --लेकिन मानव समाज में कश्यप ऋषि के दोनों वंसजों सूर्यदेव और चन्द्रदेव की बात आती है तो दोनों कश्यप ऋषि और उनकी दूसरी पत्नी अदिति के पुत्र आदित्य के पुत्र हुए जो सूर्य और चन्द्रमा के समान गुण रखते हैं और एक मानव के रूप में ही वे सूर्यदेव और चन्द्रदेव की ही तरह तेजमय और मृदुल और मनोहारी गुण से समाज को प्रभावित करते हैं और समान ऊर्जा के स्वामी है।--------विवेक पुत्र प्रदीप(सूर्य की ऊर्जा का भी स्वयं में आतंरिक मुख्य स्रोत)/सूर्यकांत। हुआ न स्वयं सूर्यदेव/ सूर्यकांत(सूर्य के स्वामी) का पुत्र । त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति----महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।          

Men are from Mars/Mangal Women(not stable on their commitment) are from Venus/Sukra.

Men are from Mars/Mangal Women(not stable on their commitment) are from Venus/Sukra:-
Data Politics after RISHI Politics:
Real/official birthday :
Monday(Somvar) 9 September, 1963/ Wednesday(Budhvar) 1 July, 1964;
Monday(Somvar) 6 September, 1976/ Friday(Sukravar) 1 July, 1977;
Friday(Sukravar) 14 April, 1978/ Friday(Sukravar) 14 April, 1978;

Tuesday(Mangalvar) 11 November(11-11), 1975/Sunday 1 August, 1976