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Wednesday, May 4, 2016

जब मैं विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति); मतलब शिव भी है, राम भी है और कृष्ण भी है और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) मतलब सनातन राम इस समस्त नारी जगत और पुरुष जगत से श्रेष्ठ और वरिष्ठ हो जाने पर भी सरस्वती का मानस पुत्र हो सकता हो मतलब उनको माँ मानते हुए शीश झुका सकता हूँ तो बहनो के आगे भी नतमस्तक हो उन अपनी बहनों के इसारे पर स्वनियंत्रित अवस्था धारण कर सकता हूँ।>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]

जब मैं विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति); मतलब शिव भी है, राम भी है और कृष्ण भी है और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) मतलब सनातन राम इस समस्त नारी जगत और पुरुष जगत से श्रेष्ठ और वरिष्ठ हो जाने पर भी सरस्वती का मानस पुत्र हो सकता हो मतलब उनको माँ मानते हुए शीश झुका सकता हूँ तो बहनो के आगे भी नतमस्तक हो उन अपनी बहनों के इसारे पर स्वनियंत्रित अवस्था धारण कर सकता हूँ।>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]

5 मई, 2006-4 मई, 2016: 11 वर्ष पूर्ण हुए मेरे सामाजिक वैचारिक तंत्र पर लेखों के लिखने के: प्रयागराज विश्विद्यालय से 5 मई, 2006 से प्रारम्भकरते हुए भारतीय संस्थान बैंगलोर (2007-2009) और पुनः प्रयागराज विश्विद्यालय मई, 2013 तक पहले ऑरकुट और उसी को ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" पर और इस ब्लॉग से सभी पोस्ट मिटाकर अगस्त, 2013 से लेकर आज तक उसी से मिलते जुलते विचारों पर फेसबुक के पोस्ट को पुन "Vivekanand and Modern Tradition" ब्लॉग पर:------------इस प्रयागराज में जिस ब्राह्मण समाज ने मुझे स्वयं को सनातन ब्राह्मण कहने की कीमत वसूल की 2001 से लेकर आज तक और पूरे विश्व का सर्वोच्च ब्राह्मण (अभीष्ट त्याग जो ब्राह्मणत्व का पर्याय है) बना दिया किसी विशेष दौर में तो उसको मैं बताना चाहता हूँ की सहस्राब्दी संक्रमण /विश्व्परिवर्तन के दौर से लेकर आज तक ब्राह्मणों के सर्वोच्च कर्तव्य अपने समाज और देश की सांस्कृतिक, शैक्षिक और वैज्ञानिक विरासत की रक्षा और उसको अटूट आधार देने में मैंने एक प्रतीक और आधार के रूप में अभिष्ठतम् कार्य प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हर तरह के अंतर्राष्ट्रीय स्तर अभिकर्ताओं द्वारा पूर्ण रूप से मानसिक रूप से अवसाद ग्रस्त किये जाने वाले प्रभावकारी परिस्थितिओं का सामना करते हुए इस विश्व मानवता के केंद्र प्रयागराज में रहकर किया है। मेरे लिए प्रमाणपत्र उनसे क्या मिलेगा जो उस संस्कृति जिसको मैंने आइना दिखा दिया है उनके प्रभाव में आकर स्वयं मेरे घर से प्रारम्भकर दुनिया के कोने-कोने तक जाल बुने पर मुझे कार्य सिध्धि से विरत न सके। अब उस जैसी संस्कृति के पोशकों को भी अंदाज हो गया होगा की उनके हाँथ किस सनातन ब्राह्मण के पुत्र पर पड़े थे और यह भी की ब्राह्मण इस दुनिया की सर्वोच्च शक्ति मतलब विश्व महाशक्ति है न की कोई देश और यह भी की उस सनातन ब्राह्मण की आगे आने वाली संतानों पर भूलकर भविष्य में हाँथ नहीं डालना है न भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ करना है?

5 मई, 2006-4 मई, 2016:  11 वर्ष पूर्ण हुए मेरे सामाजिक वैचारिक तंत्र पर लेखों के लिखने के: प्रयागराज विश्विद्यालय से 5 मई, 2006 से प्रारम्भकरते हुए भारतीय संस्थान बैंगलोर (2007-2009) और पुनः प्रयागराज विश्विद्यालय मई, 2013 तक पहले ऑरकुट और उसी को ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" पर और  इस ब्लॉग से सभी पोस्ट मिटाकर अगस्त, 2013 से लेकर आज तक उसी से मिलते जुलते विचारों पर फेसबुक के पोस्ट को पुन "Vivekanand and Modern Tradition" ब्लॉग पर:------------इस प्रयागराज में जिस ब्राह्मण समाज ने मुझे स्वयं को सनातन ब्राह्मण कहने की कीमत वसूल की  2001 से लेकर आज तक और पूरे विश्व का सर्वोच्च ब्राह्मण (अभीष्ट त्याग जो ब्राह्मणत्व का पर्याय है) बना दिया किसी विशेष दौर में तो उसको मैं बताना चाहता हूँ की सहस्राब्दी संक्रमण /विश्व्परिवर्तन के  दौर से लेकर आज तक ब्राह्मणों के सर्वोच्च कर्तव्य अपने समाज और देश की  सांस्कृतिक, शैक्षिक और वैज्ञानिक विरासत की रक्षा और उसको अटूट आधार देने में मैंने एक प्रतीक और आधार के रूप में अभिष्ठतम् कार्य प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हर तरह के अंतर्राष्ट्रीय स्तर अभिकर्ताओं द्वारा पूर्ण रूप से मानसिक रूप से अवसाद ग्रस्त किये जाने वाले प्रभावकारी परिस्थितिओं का सामना करते हुए इस विश्व मानवता के केंद्र प्रयागराज में रहकर किया है।  मेरे लिए प्रमाणपत्र उनसे क्या मिलेगा जो उस संस्कृति जिसको मैंने आइना दिखा दिया है उनके प्रभाव में आकर स्वयं मेरे घर से प्रारम्भकर दुनिया के कोने-कोने तक जाल बुने पर मुझे कार्य सिध्धि से विरत न सके। अब उस जैसी संस्कृति के पोशकों को भी अंदाज हो गया होगा की उनके हाँथ किस सनातन ब्राह्मण के पुत्र पर पड़े थे और यह भी की ब्राह्मण इस दुनिया की सर्वोच्च शक्ति मतलब विश्व महाशक्ति है न की कोई देश और यह भी की उस सनातन ब्राह्मण की आगे आने वाली संतानों पर भूलकर भविष्य में हाँथ नहीं डालना है न भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ करना है?

आप किस क्षेत्र से है और आप का कितना अनुभव है और किस संस्था से आप अपनी उपाधि पाये हैं यह क्यों पूंछा जाता है ? केवल कुछ विशेष मात्रा में उपस्थित अपवाद को छोड़कर समाजिक संदर्भ में मैं जन्म और कर्म दोनों मानता हूँ तथ्य को कोई भी संगठन और सरकार या संस्था अनगिनत प्रयास भी कर ले तो झूंठा साबित नहीं कर सकती है यह अलग की अति सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान को सबके उथ्थान हेतु लगाया जाता रहा है पर यदि ऐसे सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान लोग जिस अपने निश्चित परिवार या स्थान की सुसंस्कृति/संस्कार/सदाचार को छोड़ कर दूसरों का उत्थान करेंगे तो उनसे भी उस समाज का उथ्थान नहीं हो सकेगा? और इसी कभी न मिलने वालीं समानता हेतु ही प्रयास जारी रहता है सभी संगठन/सरकार/संस्था का लेकिन जो अपने पर अस्थिर और अविश्वासी है वह विनष्ट स्वयं हो जा रहा पर जिसकी सनातन संस्कृति/संस्कार/सदाचरण अटल है उसकी समानता कोई कभी प्राप्त ही नहीं कर सकता है। क्योंकि जन्म जिस घर और जिस स्थान पर होता है जहाँ जिस घर और स्थान पर हमारा जीवन गुजरता है वहां के संस्कार, संस्कृति और आचरण बहुतों को प्रभावित करते है और इस सबके प्रभाव से हम इंकार नही कर सकते हैं अगर हम ही नहीं अधिकाँश विश्व यही कहता और वही हम सब भी मानते हैं की भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वोच्च संस्कृति हैं। पर कर्म भी अपना प्रभाव दिखाता है और कभी कभी इतना भी दिखा सकता है की जन्म से मिले संस्कार, संस्कृति और आचरण छोटे पड़ जाएँ| लेकिन आप गीता के उस श्लोक के आधार पर जन्म प्रभाव मना नहीं कर सकते जिसमे कहा गया है की रूप, रंग, स्पर्श, गंध और रस मानव को क्या ईस्वर को भी प्रभावित करते है पर जो इनमे संतुलन स्थापित कर अपने पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है वह पुरुष योगी है। मैं दोनों पर इसलिए विश्व्वास करता हूँ क्योंकि मैं पूर्ण विस्वास से कहता हूँ की मैं इस प्रयागराज में जिस अवस्था में हूँ और जो कुछ लिखकर सामान्य मानव जीवन जी रहा हूँ वह तब न हो पाता जब मुझे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा के घर/गाँव, बिशुनपुर-223103 और स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:विलवापत्र--शिव/शिवा:सती:पार्वती:गौरी:गिरिजा: उमा:अपर्णा का भोज्य या उनका आहार या उनपर अर्पणेय और शेष बचा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण अपने घर/गाँव, रामापुर-223225 में रहने और पिता जी के ननिहाल भर्रारी/शाहगंज-223103 के सनातन वशिष्ठ गोत्रीय पूर्ण धर्म भीरु ब्राह्मण परिवार के घर में जन्म ले 3/4 वर्ष रहने का अवसर न मिल पाता। >>>>>>>>>>>>>अगर आप उपयुक्त कर्तव्य, आचरण और संस्कार में से कुछ भी अनुकूल रखते हैं तो आप अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उन तीनो से किसी भी संयोग की संतति की कोई जाति/धर्म, मुस्लिम या ईसाई अपने को मानाने या उस जाति/धर्म से होना स्वीकार करने से या उसका कहने से कभी न डरें। क्योंकि अगर इनमे से कोई एक हैं आप तो अन्य कोई एक बन सकते हैं अपने कर्तव्य, आचरण और संस्कार द्वारा इसी जन्म में पर यह जरूर है की आप सनातन ब्राह्मण केवल नहीं हो सकते उसी जन्म में जिसके लिए दूसरे जन्म की आवश्यता होती है।>>>>>>>>>>आप किस क्षेत्र से है और आप का कितना अनुभव है और किस संस्था से आप अपनी उपाधि पाये हैं यह क्यों पूंछा जाता है ? केवल कुछ विशेष मात्रा में उपस्थित अपवाद को छोड़कर समाजिक संदर्भ में मैं जन्म और कर्म दोनों मानता हूँ तथ्य को कोई भी संगठन और सरकार या संस्था अनगिनत प्रयास भी कर ले तो झूंठा साबित नहीं कर सकती है यह अलग की अति सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान को सबके उथ्थान हेतु लगाया जाता रहा है पर यदि ऐसे सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान लोग जिस अपने निश्चित परिवार या स्थान की सुसंस्कृति/संस्कार/सदाचार को छोड़ कर दूसरों का उत्थान करेंगे तो उनसे भी उस समाज का उथ्थान नहीं हो सकेगा? और इसी कभी न मिलने वालीं समानता हेतु ही प्रयास जारी रहता है सभी संगठन/सरकार/संस्था का लेकिन जो अपने पर अस्थिर और अविश्वासी है वह विनष्ट स्वयं हो जा रहा पर जिसकी सनातन संस्कृति/संस्कार/सदाचरण अटल है उसकी समानता कोई कभी प्राप्त ही नहीं कर सकता है। क्योंकि जन्म जिस घर और जिस स्थान पर होता है जहाँ जिस घर और स्थान पर हमारा जीवन गुजरता है वहां के संस्कार, संस्कृति और आचरण बहुतों को प्रभावित करते है और इस सबके प्रभाव से हम इंकार नही कर सकते हैं अगर हम ही नहीं अधिकाँश विश्व यही कहता और वही हम सब भी मानते हैं की भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वोच्च संस्कृति हैं। पर कर्म भी अपना प्रभाव दिखाता है और कभी कभी इतना भी दिखा सकता है की जन्म से मिले संस्कार, संस्कृति और आचरण छोटे पड़ जाएँ| लेकिन आप गीता के उस श्लोक के आधार पर जन्म प्रभाव मना नहीं कर सकते जिसमे कहा गया है की रूप, रंग, स्पर्श, गंध और रस मानव को क्या ईस्वर को भी प्रभावित करते है पर जो इनमे संतुलन स्थापित कर अपने पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है वह पुरुष योगी है। मैं दोनों पर इसलिए विश्व्वास करता हूँ क्योंकि मैं पूर्ण विस्वास से कहता हूँ की मैं इस प्रयागराज में जिस अवस्था में हूँ और जो कुछ लिखकर सामान्य मानव जीवन जी रहा हूँ वह तब न हो पाता जब मुझे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा के घर/गाँव, बिशुनपुर-223103 और स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:विलवापत्र--शिव/शिवा:सती:पार्वती:गौरी:गिरिजा: उमा:अपर्णा का भोज्य या उनका आहार या उनपर अर्पणेय और शेष बचा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण अपने घर/गाँव, रामापुर-223225 में रहने और पिता जी के ननिहाल भर्रारी/शाहगंज-223103 के सनातन वशिष्ठ गोत्रीय पूर्ण धर्म भीरु ब्राह्मण परिवार के घर में जन्म ले 3/4 वर्ष रहने का अवसर न मिल पाता।

आप किस क्षेत्र से है और आप का कितना अनुभव है और किस संस्था से आप अपनी उपाधि पाये हैं यह क्यों पूंछा जाता है ? केवल कुछ विशेष मात्रा में उपस्थित अपवाद को छोड़कर समाजिक संदर्भ में मैं जन्म और कर्म दोनों मानता हूँ तथ्य को कोई भी संगठन और सरकार या संस्था अनगिनत प्रयास भी कर ले तो झूंठा साबित नहीं कर सकती है यह अलग की अति सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान को सबके उथ्थान हेतु लगाया जाता रहा है पर यदि ऐसे सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान लोग जिस अपने निश्चित परिवार या स्थान की सुसंस्कृति/संस्कार/सदाचार को छोड़ कर दूसरों का उत्थान करेंगे तो उनसे भी उस समाज का उथ्थान नहीं हो सकेगा? और इसी कभी न मिलने वालीं समानता हेतु ही प्रयास जारी रहता है सभी संगठन/सरकार/संस्था का लेकिन जो अपने पर अस्थिर और अविश्वासी है वह विनष्ट स्वयं हो जा रहा पर जिसकी सनातन संस्कृति/संस्कार/सदाचरण अटल है उसकी समानता कोई कभी प्राप्त ही नहीं कर सकता है।  क्योंकि जन्म जिस घर और जिस स्थान पर होता है जहाँ जिस घर और स्थान पर हमारा जीवन गुजरता है वहां के संस्कार, संस्कृति और आचरण बहुतों को प्रभावित करते है और इस सबके प्रभाव से हम इंकार नही कर सकते हैं अगर हम ही नहीं अधिकाँश विश्व यही कहता और वही हम सब भी मानते हैं की भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वोच्च संस्कृति हैं। पर कर्म भी अपना प्रभाव दिखाता है और कभी कभी इतना भी दिखा सकता है की जन्म से मिले संस्कार, संस्कृति और आचरण छोटे पड़ जाएँ| लेकिन आप गीता के उस श्लोक के आधार पर जन्म प्रभाव मना नहीं कर सकते जिसमे कहा गया है की रूप, रंग, स्पर्श, गंध और रस मानव को क्या ईस्वर को भी प्रभावित करते है पर जो इनमे संतुलन स्थापित कर अपने पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है वह पुरुष योगी है। मैं दोनों पर इसलिए विश्व्वास करता हूँ क्योंकि मैं पूर्ण विस्वास से कहता हूँ की मैं इस प्रयागराज में जिस अवस्था में हूँ और जो कुछ लिखकर सामान्य मानव जीवन जी रहा हूँ वह तब न हो पाता जब मुझे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा के घर/गाँव, बिशुनपुर-223103 और स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:विलवापत्र--शिव/शिवा:सती:पार्वती:गौरी:गिरिजा: उमा:अपर्णा का भोज्य या उनका आहार या उनपर अर्पणेय और शेष बचा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण अपने घर/गाँव, रामापुर-223225 में रहने और पिता जी के ननिहाल भर्रारी/शाहगंज-223103 के सनातन वशिष्ठ गोत्रीय पूर्ण धर्म भीरु ब्राह्मण परिवार के घर में जन्म ले 3/4 वर्ष रहने का अवसर न मिल पाता। >>>>>>>>>>>>>अगर आप उपयुक्त कर्तव्य, आचरण और संस्कार में से कुछ भी अनुकूल रखते हैं तो आप अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उन तीनो से किसी भी संयोग की संतति की कोई जाति/धर्म, मुस्लिम या ईसाई अपने को मानाने या उस जाति/धर्म से होना स्वीकार करने से या उसका कहने से कभी न डरें। क्योंकि अगर इनमे से कोई एक हैं आप तो अन्य कोई एक बन सकते हैं अपने कर्तव्य, आचरण और संस्कार द्वारा इसी जन्म में पर यह जरूर है की आप सनातन ब्राह्मण केवल नहीं हो सकते उसी जन्म में जिसके लिए दूसरे जन्म की आवश्यता होती है।>>>>>>>>>>आप किस क्षेत्र से है और आप का कितना अनुभव है और किस संस्था से आप अपनी उपाधि पाये हैं यह क्यों पूंछा जाता है ? केवल कुछ विशेष मात्रा में उपस्थित अपवाद को छोड़कर समाजिक संदर्भ में मैं जन्म और कर्म दोनों मानता हूँ तथ्य को कोई भी संगठन और सरकार या संस्था अनगिनत प्रयास भी कर ले तो झूंठा साबित नहीं कर सकती है यह अलग की अति सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान को सबके उथ्थान हेतु लगाया जाता रहा है पर यदि ऐसे सुसंस्कृति/संस्कारवान/सदाचारवान लोग जिस अपने निश्चित परिवार या स्थान की सुसंस्कृति/संस्कार/सदाचार को छोड़ कर दूसरों का उत्थान करेंगे तो उनसे भी उस समाज का उथ्थान नहीं हो सकेगा? और इसी कभी न मिलने वालीं समानता हेतु ही प्रयास जारी रहता है सभी संगठन/सरकार/संस्था का लेकिन जो अपने पर अस्थिर और अविश्वासी है वह विनष्ट स्वयं हो जा रहा पर जिसकी सनातन संस्कृति/संस्कार/सदाचरण अटल है उसकी समानता कोई कभी प्राप्त ही नहीं कर सकता है।  क्योंकि जन्म जिस घर और जिस स्थान पर होता है जहाँ जिस घर और स्थान पर हमारा जीवन गुजरता है वहां के संस्कार, संस्कृति और आचरण बहुतों को प्रभावित करते है और इस सबके प्रभाव से हम इंकार नही कर सकते हैं अगर हम ही नहीं अधिकाँश विश्व यही कहता और वही हम सब भी मानते हैं की भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वोच्च संस्कृति हैं। पर कर्म भी अपना प्रभाव दिखाता है और कभी कभी इतना भी दिखा सकता है की जन्म से मिले संस्कार, संस्कृति और आचरण छोटे पड़ जाएँ| लेकिन आप गीता के उस श्लोक के आधार पर जन्म प्रभाव मना नहीं कर सकते जिसमे कहा गया है की रूप, रंग, स्पर्श, गंध और रस मानव को क्या ईस्वर को भी प्रभावित करते है पर जो इनमे संतुलन स्थापित कर अपने पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है वह पुरुष योगी है। मैं दोनों पर इसलिए विश्व्वास करता हूँ क्योंकि मैं पूर्ण विस्वास से कहता हूँ की मैं इस प्रयागराज में जिस अवस्था में हूँ और जो कुछ लिखकर सामान्य मानव जीवन जी रहा हूँ वह तब न हो पाता जब मुझे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा के घर/गाँव, बिशुनपुर-223103 और स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:विलवापत्र--शिव/शिवा:सती:पार्वती:गौरी:गिरिजा: उमा:अपर्णा का भोज्य या उनका आहार या उनपर अर्पणेय और शेष बचा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण अपने घर/गाँव, रामापुर-223225 में रहने और पिता जी के ननिहाल भर्रारी/शाहगंज-223103 के सनातन वशिष्ठ गोत्रीय पूर्ण धर्म भीरु ब्राह्मण परिवार के घर में जन्म ले 3/4 वर्ष रहने का अवसर न मिल पाता।

Friday, April 29, 2016

नुक्ता के हेर फेर से खुदा जुदा हो जाता है पर उनका खुदा जुदा नहीं होता जिनके लिए खुदा के ऊपर से नुक्ता कोई और साजिस के तहत जुदा कर देता है । खुदा ऐसे सभी वन्दों की सुधि जरूर लेता है वस पहचानने की देर है कैसे सुधि लिया और कैसे ले रहा और कैसे लेगा भी?

नुक्ता के हेर फेर से खुदा जुदा हो जाता है पर उनका खुदा जुदा नहीं होता जिनके लिए खुदा के ऊपर से नुक्ता कोई और साजिस के तहत जुदा कर देता है । खुदा ऐसे सभी वन्दों की सुधि जरूर लेता है वस पहचानने की देर है कैसे सुधि लिया और कैसे ले रहा और कैसे लेगा भी?

सत्याचरण में न ला सके तो यह आपकी अज्ञानता या मजबूरी केवल हो सकती है किसी कारन वश पर आप ने सत्य को पहचानते और जानते हुए भी उस सत्य को अपमानित जब कर दिया बिना किसी सम्यक मानवता हित पालन को ध्यान में रखते हुए तो उससे बड़ा अपराध और अमर्यादित आचरण कुछ नहीं है इस ब्रह्माण्ड/मानव जगत में ?

सत्याचरण में न ला सके तो यह आपकी अज्ञानता या मजबूरी केवल हो सकती है किसी कारन वश पर आप ने सत्य को पहचानते और जानते हुए भी उस सत्य को अपमानित जब कर दिया बिना किसी सम्यक मानवता हित पालन को ध्यान में रखते हुए तो उससे बड़ा अपराध और अमर्यादित आचरण कुछ नहीं है इस ब्रह्माण्ड/मानव जगत में ?

विश्व गुरु जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र ही है चाहे गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के माध्यम से ही हो और यह जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की कर्म स्थली थी और जिसने परशुराम के गुरुकुल के माध्यम से केरल से प्रारम्भ कर उत्तराखंड/उत्तराँचल तक अपने गुरुकुल स्थापित करते हुए शिक्षा देते रहे और लोगों को ब्राह्मण बनाते रहे और इस प्रकार ब्राह्मणत्व गुण (त्याग) और धारण क्षमता में श्रेष्ठ भृगुकुल की परम्परा के क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर) विष्वगुरू की परम्परा को इस महा विश्व्परिवर्तन के संक्रमण काल में भी अपनी गुरुता बनाए रखा। >>>>>>>>>>>>दुनिया की हर महा सुनामी और हर महाशिव तांडव जिस द्वार=चौखट पर आकर शांत हो जाता है वह है बिशुनपुर-223103 , जौनपुर(जामदग्निपुर) के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के विष्णुकुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) का मुख्य द्वार=चौखट उसके सामने विवेकानंद क्या है? मैं स्वयं उस गाँव के अन्य सब लोगों के लिए स्वयं पूज्य पर उस कुल के लिए पूज्य नहीं (जिनका नाति और भांजा स्वयं हूँ जो वास्तविकता में हिन्दू रीती में सब जाती/धर्म के घर वालों में पूज्य होते है) वह कुल मेरे लिए ही पूज्य है। और इसी लिए सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर (विष्णु) के लिए परमगुरु परमपिता परमेश्वर और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊ श्रध्देय डॉ प्रेमचंद (शिव) जी के लिए केवल परमपिता परमेश्वर सम्बोधन प्रयोग करता हूँ। मतलब विष्णु त्रिदेवो में सर्वश्रेष्ठ गुरु और आयुवर्ग में मध्य के /लक्ष्मी जी आयुवर्ग में मध्य की; शिव:त्रिदेवों में ज्येष्ठतम मतलब आद्या मतलब आद्याशंकर तथा त्रिदेवों में सबसे बड़े आचार्य (जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ) /पार्वती जी सबसे छोटी जो ब्रह्मा और सरस्वती की पौत्री है; ब्रह्मा सबसे बड़े ज्ञानी)/सरस्वती जी त्रिदेवियों में आद्या:आदिदेवी, पर सब अपनी पत्नियों के संयोग के साथ समान रूप से श्रेष्ठ और वरिष्ठ है। पर सर्वश्रेष्ठ गुरु ही होता है जो जीवन को दिशा देता है हर मनवता की श्रेष्ठ उपलब्धि हेतु उस ज्ञान और शोध को जीवन में व्यवस्थित रूप से प्रयोग करने हेतु और वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ है और अर्चनीय, वन्दनीय, उपासनीय व् अनुकरणीय है लेकिन वरिष्ठ वह ही होता है जो ज्येष्ठतम और जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ होता है। अतः विष्वमहापरिवर्तन की मुख्य कमान शिवरामकृष्ण कुल मतलब रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/चन्द्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/शशांकशेखर के देवव्रत/गंगापुत्र के कुल पास रही और सहयोग बिशुनपुर-223103 और प्रयागराज के साथ सम्पूर्ण मानवता प्रेमियों का रहा। >>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]

विश्व गुरु जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र ही है चाहे गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के माध्यम से ही हो और यह जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र  परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की कर्म स्थली थी और जिसने परशुराम के गुरुकुल के माध्यम से केरल से प्रारम्भ कर उत्तराखंड/उत्तराँचल तक अपने गुरुकुल स्थापित करते हुए शिक्षा देते रहे और लोगों को ब्राह्मण बनाते रहे और इस प्रकार  ब्राह्मणत्व गुण (त्याग) और धारण क्षमता में श्रेष्ठ भृगुकुल की परम्परा के क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर) विष्वगुरू की परम्परा को इस महा विश्व्परिवर्तन के संक्रमण काल में भी अपनी गुरुता बनाए रखा। >>>>>>>>>>>>दुनिया की हर महा सुनामी और हर महाशिव तांडव जिस द्वार=चौखट पर आकर शांत हो जाता है वह है बिशुनपुर-223103 , जौनपुर(जामदग्निपुर) के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के विष्णुकुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) का मुख्य द्वार=चौखट उसके सामने विवेकानंद क्या है? मैं स्वयं उस गाँव के अन्य सब लोगों के लिए स्वयं पूज्य पर उस कुल के लिए पूज्य नहीं  (जिनका नाति और भांजा स्वयं हूँ जो वास्तविकता में हिन्दू रीती में सब जाती/धर्म के घर वालों में पूज्य होते है) वह कुल मेरे लिए ही पूज्य है।  और इसी लिए सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर (विष्णु) के लिए परमगुरु परमपिता परमेश्वर और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊ श्रध्देय डॉ प्रेमचंद (शिव) जी के लिए केवल परमपिता परमेश्वर सम्बोधन प्रयोग करता हूँ। मतलब विष्णु त्रिदेवो में सर्वश्रेष्ठ गुरु और आयुवर्ग में मध्य के /लक्ष्मी जी आयुवर्ग में मध्य की;  शिव:त्रिदेवों में ज्येष्ठतम मतलब आद्या मतलब आद्याशंकर तथा त्रिदेवों में सबसे बड़े आचार्य (जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ) /पार्वती जी सबसे छोटी जो ब्रह्मा और सरस्वती की पौत्री है; ब्रह्मा सबसे बड़े ज्ञानी)/सरस्वती जी त्रिदेवियों में आद्या:आदिदेवी, पर सब अपनी पत्नियों के संयोग के साथ समान रूप से श्रेष्ठ और वरिष्ठ है। पर सर्वश्रेष्ठ गुरु ही होता है जो जीवन को दिशा देता है हर मनवता की श्रेष्ठ उपलब्धि हेतु उस ज्ञान और शोध को जीवन में व्यवस्थित रूप से प्रयोग करने हेतु और वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ है और अर्चनीय, वन्दनीय, उपासनीय व् अनुकरणीय है लेकिन वरिष्ठ  वह  ही होता है  जो ज्येष्ठतम और  जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ होता है। अतः विष्वमहापरिवर्तन की मुख्य कमान शिवरामकृष्ण कुल मतलब रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/चन्द्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/शशांकशेखर के देवव्रत/गंगापुत्र के कुल पास रही और सहयोग बिशुनपुर-223103 और प्रयागराज के साथ सम्पूर्ण मानवता प्रेमियों का रहा। >>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]

2001 जैसा समय गवाह है इस विश्व मानवता के लिए की "सबसे कठिन जाति अपमाना" नहीं बल्कि "सबसे कठिन सत्य ठुकराना" और उसके बाद भी अपनी ढपली और अपना राग जाति अपमाना का बजाये जा रहे हैं? जाति अपमान करने वाला तो सजा पाता ही है और जाति अपमान पाने वाला अगर इससे शीख लिया और सत्यगत रहा तो अपमान करने वाले से और अधिक उच्च पद का स्वामी स्वयं बन सकता है पर यदि एक ही वास्तविक/असली सत्य को ठुकरा दिया जाय तो यह संसार राम, शिव और भीम को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक बना देता है और तथाकथित नारीवादी लोग स्वयं सीता, सती:पार्वती और द्रौपदी को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक की भार्या बना देते हैं। इससे ज्यादा क्या कहें बिना अन्तह निहितार्थ भाव तक के सत्य का अनुभव लिए ये तथाकथित नारीवादी लोग भगवान राम को मर्यादापुरुषोत्तम कहने को भी पाप कहने और कहलवाने लगते हैं ।

2001 जैसा समय गवाह है इस विश्व मानवता के लिए की "सबसे कठिन जाति अपमाना" नहीं बल्कि "सबसे कठिन सत्य ठुकराना" और उसके बाद भी अपनी ढपली और अपना राग जाति अपमाना का बजाये जा रहे हैं? जाति अपमान करने वाला तो सजा पाता ही है और जाति अपमान पाने वाला अगर इससे शीख लिया और सत्यगत रहा तो अपमान करने वाले से और अधिक उच्च पद का स्वामी स्वयं बन सकता है पर यदि एक ही वास्तविक/असली सत्य को ठुकरा दिया जाय तो यह संसार राम, शिव और भीम को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक बना देता है और तथाकथित नारीवादी लोग स्वयं सीता, सती:पार्वती और द्रौपदी को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक की भार्या बना देते हैं। इससे ज्यादा क्या कहें बिना अन्तह निहितार्थ भाव तक के सत्य का अनुभव लिए ये तथाकथित नारीवादी लोग भगवान राम को मर्यादापुरुषोत्तम कहने को भी पाप कहने और कहलवाने लगते हैं ।