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Monday, July 21, 2014

I have suggestion from my closed friends to stop my posts and I accepted even not to post it on my social blog "VIVEKANAND AND MODERN TRADITION". I hope up to a quite extent my work has been done i.e. Only SHRI RAM: RAMJANKI: SITARAM is Satyanarayan: Parambrahm/Brahm: Paramguru: Parameshwar:ALLAH:GOD:ISWAR who may known with other name Shri Krishna :RADHAKRISHN too who have control on all seven Sun or who ride on chariot of Seven Sun have no rope or only who called Suryakant:Pradeep or only who have control on Seven Rishis from Prayagraj /Allahabad, the Source of world humanity. (I avoided till date to disclose the power of Super Power: Makaradhwaj's Kingdom (Vishv-ashakti) and his agent's power also in India in comparison with power of their father Hanuman /Ambedkar /Ambavaadekar /Kesharinanadan/Anjaney /Pavansut /Marutinandan /Shankarsuman/Mahaveer /Bajarang even I have every updated news from time to time and even agent of Super Power even tried to prove me the SHOODRATAM person of this world (2001-2007) for make some one Slumdog Millionaire for achieving their selfish goal against me although in which they failed and I succeeded to achieve my goal(2007) but when they crosses the extreme of humanity and crosses the natural law(2014) I have given a little statement by which any able person can guess their original power and in connection with this I hope this will not affect the image of Super Power(Vishva-Shakti) because I have given such statement publicly after a long delay of the each and every events happening and a best settlement has been done by the Antar-Rashtrya Swayamsevak Sangh(ARSS)[International Self Servant Association] to successful government of the modern world and countries in individual|*******Jai Hind(Jamboo Dweep :Euresia:Europ+Asia: at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat (Akhand Bharat :Bharatkhand: Bharatvarsh), Jai Shri Ram/Krishna.>>>>>मेरा जमदग्निऋषि के सम्मान में बने जौनपुर/जमदग्निपुर जिले में सनातन वशिष्ठ गोत्रियों के यहां जन्म लिया हूँ और जौनपुर के सनातन गौतम गोत्रियों के यहां शिक्षा ही नहीं वरन जीवन का सर्वाधिक समय गुजारा हूँ तथा पैतृक रूप से सनातन कश्यप गोत्रीय और ऋषि दुर्वाशा की भूमि आर्यमगढ़/आजमगढ़ का हूँ तो, जो जौनपुर शिक्षा-संस्कृति-संस्कार और व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास न की छद्म पांडित्य के लिए पूरे विश्व में सर्वोच्च स्थान रखता है मै उसी श्रेष्ठ संस्कार वाले स्थान पर एक श्रेष्ठ छात्र जीवन जिया हूँ और बहुत से अनुभवों से गुजरा हूँ। अतः सामने वाला मेरे ऊपर चाल चलने से कहाँ तक सफल होगा यह अनुमान रहता है और यही मुझे स्थिर जीवन देता है क्योंकि मै भी समाज के अधिकतम हित के लिए ही अपनी ऊर्जा और पुरुषार्थ का सदुपयोग करता हूँ अगर उसके प्रयोग का एक मार्ग बंद होता है तो कौसल नरेश दशरथ(जो देशों दिशाओं में रथ ले जा सके वह यह की उस समय लोग फ्रैक्टल: बहु विमाओं को प्रयोग में शायद नहीं लाते थे) की तरह दूसरा मार्ग खोल देता हूँ और देखता हूँ की पहला कब तक अवरुद्ध किया जा सकता है। ----जो स्वयं पुरुषार्थी और उद्यमी हो और उसकी नियति ही स्वक्ष हो तो उसे कौन जीत सकता है।


I have suggestion from my closed friends to stop my posts and I accepted even not to post it on my social blog "VIVEKANAND AND MODERN TRADITION". I hope up to a quite extent my work has been done i.e. Only SHRI RAM: RAMJANKI: SITARAM is Satyanarayan: Parambrahm/Brahm: Paramguru: Parameshwar:ALLAH:GOD:ISWAR who may known with other name Shri Krishna :RADHAKRISHN too who have control on all seven Sun or who ride on chariot of Seven Sun have no rope or only who called Suryakant:Pradeep or only who have control on Seven Rishis from Prayagraj /Allahabad, the Source of world humanity. (I avoided till date to disclose the power of Super Power: Makaradhwaj's Kingdom (Vishv-ashakti) and his agent's power also in India in comparison with power of their father Hanuman /Ambedkar /Ambavaadekar /Kesharinanadan/Anjaney /Pavansut /Marutinandan /Shankarsuman/Mahaveer /Bajarang even I have every updated news from time to time and even agent of Super Power even tried to prove me the SHOODRATAM person of this world (2001-2007) for make some one Slumdog Millionaire for achieving their selfish goal against me although in which they failed and I succeeded to achieve my goal(2007) but when they crosses the extreme of humanity and crosses the natural law(2014) I have given a little statement by which any able person can guess their original power and in connection with this I hope this will not affect the image of Super Power(Vishva-Shakti) because I have given such statement publicly after a long delay of the each and every events happening and a best settlement has been done by the Antar-Rashtrya Swayamsevak Sangh(ARSS)[International Self Servant Association] to successful government of the modern world and countries in individual|  मेरा जमदग्निऋषि के सम्मान में बने जौनपुर/जमदग्निपुर जिले में सनातन वशिष्ठ गोत्रियों के यहां जन्म लिया हूँ और जौनपुर के सनातन गौतम गोत्रियों के यहां शिक्षा ही नहीं वरन जीवन का सर्वाधिक समय गुजारा हूँ तथा पैतृक रूप से सनातन कश्यप गोत्रीय और ऋषि दुर्वाशा(कृष्णात्रे(त्रेय कृष्ण))की भूमि आर्यमगढ़/आजमगढ़ का हूँ तो, जो जौनपुर शिक्षा-संस्कृति-संस्कार और व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास न की छद्म पांडित्य के लिए पूरे विश्व में सर्वोच्च स्थान रखता है मै उसी श्रेष्ठ संस्कार वाले स्थान पर एक श्रेष्ठ छात्र जीवन जिया हूँ और बहुत से अनुभवों से गुजरा हूँ। अतः सामने वाला मेरे ऊपर चाल चलने से कहाँ तक सफल होगा यह अनुमान रहता है और यही मुझे स्थिर जीवन देता है क्योंकि मै भी समाज के अधिकतम हित के लिए ही अपनी ऊर्जा और पुरुषार्थ का सदुपयोग करता हूँ अगर उसके प्रयोग का एक मार्ग बंद होता है तो कौसल नरेश दशरथ(जो देशों दिशाओं में रथ ले जा सके वह यह की उस समय लोग फ्रैक्टल: बहु विमाओं को प्रयोग में शायद नहीं लाते थे) की तरह दूसरा मार्ग खोल देता हूँ और देखता हूँ की पहला कब तक अवरुद्ध किया जा सकता है। ----जो स्वयं पुरुषार्थी और उद्यमी हो और उसकी नियति ही स्वक्ष हो तो उसे कौन जीत सकता है|-----------------------------------------------------Valmiki’s Ramayan indicate that Shri Rama was 25 years old when he left Ayodhya for his 14 years of exile (1975---2000-----2014)|उपमन्यु (बाजपाई) गोत्र वशिष्ठ गोत्र प्रवर में में शामिल हैं| अतः यह पारासर की तरह वशिष्ठ के वंसज में आते हैं। और बाजपाई ब्राह्मण का गोत्र उपमन्यु होता है। अतः यह वशिष्ठ या वशिष्ठ से वंसज हुए पारासर गोत्रियों की तरह। गौतम की तरह वशिष्ठ भी कैलाश पर महादेव शिव की छाया में रहते थे अतः ये भी शिव के गौत्तम जैसे श्रेष्ठ भक्तों में शामिल हैं |>>>>>>>>>> मुझे पागल खानदान का जिस तत्कालीन शक्तिशाली राजनेताओं (के नाम का नाजायज लाभ लेने वाले लोगों जबकि उनमे से दो मेरे मेरे प्रिय थे जिनकी वर्तमान अवस्था पर मुझे स्वयं वेहद कस्ट है और इन दो में से एक (बाजपाई) मेरे सर्व प्रिय और जिन्हे मै आज भी राम-रत्न कहता हूँ इस वर्तमानयुग का अगर कोई है तो जार्ज फर्नांडीज मुंबई ट्रेड यूनियन में मेरे बाबा के मित्र थे) की शक्ति के बल पर कहा गया उनमे से दो आज मानसिक अवसाद के खुद शिकार है जो केंद्र की सत्ता के उस समय प्रमुख थे और एक के संश्थापक नेता मानशिक विक्षिप्तता की अवस्था में ही मर गए जिनकी सत्ता उत्तर प्रदेश(अल्लाहाबाद) में थी तत्कालीन। तो यह मेरिट भी उनके छद्म अनुयायियों की मेरिट में जोड़ दी जानी चाहिए जो मुझे खानदानी पागल या तो कहे थे या कहवाए थे। बाकी अन्य अपनी अज्ञानता के शिकार हैं उनकी भी दवा हो जाएगी अभी अर्श से फ़र्श का सफर करने दीजिये।-----शायद उस अम्बेडकर जो तथा कथित दलित थे को सवर्णों ने सताया होगा पर इस अम्बेडकर जो स्वयं सवर्ण थे का क्या जिसको तथाकथित दलितों के इसारे पर और तथा कथित दलित हिट के लिए सवर्णों ने सताया?*******Jai Hind(Jamboo Dweep :Euresia:Europ+Asia: at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat (Akhand Bharat :Bharatkhand: Bharatvarsh), Jai Shri Ram/Krishna.







 


Saturday, July 19, 2014

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 4 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. *******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 4 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।----------------------------------------बीती हुई रत मई स्वप्न देखता हूँ जिसमे एक भव्य गुरु द्वारे में जाता हूँ जो बहुत दूरी तक फैला हुआ है और अंदर जाने के लिए बनी हुई पकडंडी सड़क के दोड़न किनारे पानी बह रहा है और गुरु द्वारे में प्रवेश करते ही ही गुरुग्रंथ और एक चमचमाती तलवार रखी है जिसे मै मथ्था टेककर प्रणाम करता हूँ और आगे कुछ और देखने बहुत सकेत सीढ़ी जिसमे से जाने में मुझे कुछ दिक्कत हो रही है के माध्यम से जमीन के एक ताल आदर जाता हूँ और वहा भगवान श्रीराम, माता सीता, भाई लक्षमण और हनुमान की बड़ी मूर्ति सज्जा के साथ रखी है जिसे मई प्रणाम करते हुए आगे बढ़ता हूँ जमीन के तीसरे तले में जहा पुनः निकली हुई धुप है और इस प्रकार वाह्य स्वरुप में विस्तृत तालाब है जिसमे लोग नहा रहे हैं और मै भी डुबकी लगाता हूँ और कपडे पहनकर कुछ दुकानों पर घूमता हूँ जो दर्शकों के जलपान के लिए बनी हुई हैं और एक दूकान पर चीनी के साथ दही खाता हुई और पानी पीता हूँ और मुझे वह व्यक्ति और पानी पिलाता है जिसका बहुत बड़ा विजनेश कई स्थाप पर चलता है और वह मुझे शरीर पर केवल आधी धोती पहने और आधी कमर में लपेटे नजर आ रहा था और जब उसके विस्तृत विजिनेस के बारे में सूना तो चकित रह गया की यह क्यों स्वयं गुरुद्वारे के दर्शनार्थियों को दही खिला रहा है इतना बढ़ा व्यक्ति होते हुए तो वह स्वयं कहता है की यही तो मेरी आस्था मुझे इतना बड़ा विजिनेस खड़ा करने की शक्ति दिया। इस प्रकार के अनुभव के बाद मुझे स्वप्न का और अंश याद नहीं। लेकिन इतना जरूर समझ में आ रहा की प्रेम के बाद आस्था ही दूसरी शक्ति है जो इस संसार को चला रही वह आस्था किशी पर हो तो ठीक है पर अगर वह इस्वर पर है तो इसका कोई मोल नहीं। इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।

इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।----------------------------------------बीती हुई रत मई स्वप्न देखता हूँ जिसमे एक भव्य गुरु द्वारे में जाता हूँ जो बहुत दूरी तक फैला हुआ है और अंदर जाने के लिए बनी हुई पकडंडी सड़क के दोड़न किनारे पानी बह रहा है और गुरु द्वारे में प्रवेश करते ही ही गुरुग्रंथ और एक चमचमाती तलवार रखी है जिसे मै मथ्था टेककर प्रणाम करता हूँ और आगे कुछ और देखने बहुत सकेत सीढ़ी जिसमे से जाने में मुझे कुछ दिक्कत हो रही है के माध्यम से जमीन के एक ताल आदर जाता हूँ और वहा भगवान श्रीराम, माता सीता, भाई लक्षमण और हनुमान की बड़ी मूर्ति सज्जा के साथ रखी है जिसे मई प्रणाम करते हुए आगे बढ़ता हूँ जमीन के तीसरे तले में जहा पुनः निकली हुई धुप है और इस प्रकार वाह्य स्वरुप में विस्तृत तालाब है जिसमे लोग नहा रहे हैं और मै भी डुबकी लगाता हूँ और कपडे पहनकर कुछ दुकानों पर घूमता हूँ जो दर्शकों के जलपान के लिए बनी हुई हैं और एक दूकान पर चीनी के साथ दही खाता हुई और पानी पीता हूँ और मुझे वह व्यक्ति और पानी पिलाता है जिसका बहुत बड़ा विजनेश कई स्थाप पर चलता है और वह मुझे शरीर पर केवल आधी धोती पहने और आधी कमर में लपेटे नजर आ रहा था और जब उसके विस्तृत विजिनेस के बारे में सूना तो चकित रह गया की यह क्यों स्वयं गुरुद्वारे के दर्शनार्थियों को दही खिला रहा है इतना बढ़ा व्यक्ति होते हुए तो वह स्वयं कहता है की यही तो मेरी आस्था मुझे इतना बड़ा विजिनेस खड़ा करने की शक्ति दिया। इस प्रकार के अनुभव के बाद मुझे स्वप्न का और अंश याद नहीं। लेकिन इतना जरूर समझ में आ रहा की प्रेम के बाद आस्था ही दूसरी शक्ति है जो इस संसार को चला रही वह आस्था किशी पर हो तो ठीक है पर अगर वह इस्वर पर है तो इसका कोई मोल नहीं। इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।

Friday, July 18, 2014

Mandookopanishad---"Satyamev Jayate": Harischand was 33rd Ancestor of Shri Rama who was the 64th Ruler of Surya Vansh(SOALAR DYNASTY) therefore all are descendent of Kashyapa and Aditi i.e. they are sescendent of Aditya i.e. Sun(in similar way Moon Dynasty:Vrishni Vansh/Chandra Vansh/Shri Krishna, Nag Vansh and others in same category are also a descendent of Kashyapa and Aditi’s son’s): Name of ancestors and descendants of Shri Ram are given in serial no. but not in chronological order: 1. Manu 33. Hariscandra 65. Kusa 2. Iksvaku 34. Rohita 66. Atithi 3. Vikuksi-Sasada 35. Harita, Cancu 67. Nisadha 4. Kakutstha 36. Vijaya 68. Nala 5. Anenas 37. Ruruka 69. Nabhas 6. Prithu 38. Vrka 70. Pundarika 7. Vistarasva 39. Bahu (Asita) 71. Ksemadhanvan 8. Ardra 40. Sagara 72. Devanika 9. Yuvanasva (I) 41. Asamanjas 73. Ahinagu 10. Sravasta 42. Amsumant 74. Paripatra 11. Brihadasva 43. Dilipa (I) 75. Bala 12. Kuvalasva 44. Bhagiratha 76. Uktha 13. Drdhasva 45. Sruta 77. Vajranabha 14. Pramoda 46. Nabhaga 78. Sankhan 15. Haryasva (I) 47. Amabarisa 79. Vyusitasva 16. Nikumba 48. Sindhudvipa 80. Visvasaha (II) 17. Samhatasva 49. Ayutayus 81. Hiranyabha 18. Akrsasva 50. Rtuparna 82. Pusya 19. Prasenajit 51. Sarvakama 83. Dhruvasandhi 20. Yuvanasva (II) 52. Sudasa 84. Sudarsana 21. Mandhatr 53. Mitrasaha 85. Agnivarna 22. Purukutsa 54. Asmaka 86. Sighra 23. Trasadsyu 55. Mulaka 87. Maru 24. Sambhuta 56. Sataratha 88. Prasusruta 25. Anaranya 57. Aidavida 89. Susandhi 26. Trasadsva 58. Visvasaha (I) 90. Amarsa 27. Haryasva (II) 59. Dilipa (II) 91. Mahashwat 28. Vasumata 60. Dirghabahu 92. Visrutavant 29. Tridhanvan 61. Raghu 93. Brihadbala 30. Trayyaruna 62. Aja 94. Brihatksaya 31. Trishanku 63. Dasaratha 32. Satyavrata 64. Rama

Mandookopanishad---"Satyamev Jayate": Harischand was 33rd Ancestor of Shri Rama who was the 64th Ruler of Surya Vansh(SOALAR DYNASTY) therefore all are descendent of Kashyapa and Aditi i.e. they are sescendent of Aditya i.e. Sun(in similar way Moon Dynasty:Vrishni Vansh/Chandra Vansh/Shri Krishna, Nag Vansh and others in same category are also a descendent of Kashyapa and Aditi’s son’s): Name of ancestors and descendants of Shri Ram are given in serial no. but not in chronological order: 
1. Manu 33. Hariscandra 65. Kusa
2. Iksvaku 34. Rohita 66. Atithi
3. Vikuksi-Sasada 35. Harita, Cancu 67. Nisadha
4. Kakutstha 36. Vijaya 68. Nala
5. Anenas 37. Ruruka 69. Nabhas
6. Prithu 38. Vrka 70. Pundarika
7. Vistarasva 39. Bahu (Asita) 71. Ksemadhanvan
8. Ardra 40. Sagara 72. Devanika
9. Yuvanasva (I) 41. Asamanjas 73. Ahinagu
10. Sravasta 42. Amsumant 74. Paripatra
11. Brihadasva 43. Dilipa (I) 75. Bala
12. Kuvalasva 44. Bhagiratha 76. Uktha
13. Drdhasva 45. Sruta 77. Vajranabha
14. Pramoda 46. Nabhaga 78. Sankhan
15. Haryasva (I) 47. Amabarisa 79. Vyusitasva
16. Nikumba 48. Sindhudvipa 80. Visvasaha (II)
17. Samhatasva 49. Ayutayus 81. Hiranyabha
18. Akrsasva 50. Rtuparna 82. Pusya
19. Prasenajit 51. Sarvakama 83. Dhruvasandhi
20. Yuvanasva (II) 52. Sudasa 84. Sudarsana
21. Mandhatr 53. Mitrasaha 85. Agnivarna
22. Purukutsa 54. Asmaka 86. Sighra
23. Trasadsyu 55. Mulaka 87. Maru
24. Sambhuta 56. Sataratha 88. Prasusruta
25. Anaranya 57. Aidavida 89. Susandhi
26. Trasadsva 58. Visvasaha (I) 90. Amarsa
27. Haryasva (II) 59. Dilipa (II) 91. Mahashwat
28. Vasumata 60. Dirghabahu 92. Visrutavant
29. Tridhanvan 61. Raghu 93. Brihadbala
30. Trayyaruna 62. Aja 94. Brihatksaya
31. Trishanku 63. Dasaratha
32. Satyavrata 64. Rama

Both the God Shiv and Godess Shiva:Parvati:Durga are Trayambak and Trayambake respectively :Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek). Thus when God is not safe without their third hidden eye: Vivek then how a person can survive without Vivek(Inner voice:inner justice) Mantra Namo devyaiee maha devyaiee shive sarvarth sadhike Sharanye tryambake gauri narayani namostute ll मंत्र नमो देव्यै महा देव्यै शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ll The mantra is primarily to gain the blessings of the goddess. It means “I bow before you Oh great goddess the bestower of everything auspicious, I seek refuge in you, and Oh Triambake (Three eyed one:Vivek) Gauri Narayani I salute you “ Sarva-mangala-mangalye Shive sarvartha-sadhike; sharanye Tryambake Gauri Narayani namo’stu te ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥ Thou art the all auspicious Shiva(Ahakti aspect), the bountiful; I porostrate myself at Thy feet. O Triyambake(three eyed one:Vivek), Gauri (the one with a fair complexion-Parvati) Narayani. Mahamritunjay Mantra Given by Rishi Markandeya to worship the Shiv whi have Trishul Power (Kedareshwar-Mahamritunjay-Vishveshawar:Vishvanath) मंत्र ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।। OM. We worship the Three-eyed Lord:Trayambak:Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek) who is fragrant and who nourishes and nurtures all beings. As is the ripened cucumber (with the intervention of the gardener) is freed from its bondage (to the creeper), may he liberate us from death for the sake of immortality.

Both the God Shiv and Godess Shiva:Parvati:Durga are Trayambak and Trayambake respectively :Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek). Thus when God is not safe without their third hidden eye: Vivek then how a person can survive without Vivek(Inner voice:inner justice)

Mantra
Namo devyaiee maha devyaiee shive sarvarth sadhike
Sharanye tryambake gauri narayani namostute ll
मंत्र
नमो देव्यै महा देव्यै शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ll
The mantra is primarily to gain the blessings of the goddess. It means “I bow before you Oh great goddess the bestower of everything auspicious, I seek refuge in you, and Oh Triambake (Three eyed one:Vivek) Gauri Narayani I salute you “

Sarva-mangala-mangalye Shive sarvartha-sadhike;
sharanye Tryambake Gauri Narayani namo’stu te

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
Thou art the all auspicious Shiva(Ahakti aspect), the bountiful; I porostrate myself at Thy feet. O Triyambake(three eyed one:Vivek), Gauri (the one with a fair complexion-Parvati) Narayani.

Mahamritunjay Mantra Given by Rishi Markandeya to worship the Shiv whi have Trishul Power (Kedareshwar-Mahamritunjay-Vishveshawar:Vishvanath)

मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।

उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

OM. We worship the Three-eyed Lord:Trayambak:Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek) who is fragrant and who nourishes and nurtures all beings. As is the ripened cucumber (with the intervention of the gardener) is freed from its bondage (to the creeper), may he liberate us from death for the sake of immortality.

क्या दोनों(दुर्वाशा ऋषि और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर) लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोनों के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।---------दुर्वाशा के सम्बन्ध में जब श्राप का जिक्र आता है तो कौसल साम्राज्य को जलाकर कर राख कर देने का प्रसंग कभी आता है और कभी यह कभी वह जलाकर रखा कर दूंगा और अनल(अग्नि) बाण जैसे वाक्य सामने आते हैं और यहां तक की उनको ही अग्नि का अवतार और महाकालेश्वर शिव का अवतार लोग कहते हैं और महामंगलेश्वर भी कहे जाते हैं श्राप और आशीर्वाद का विश्लेषण यदि किया जाय तो और हनुमान जी भी मंगलेश्वर ही हैं फिर भी लंका को ही जला दिए पूंछ में आग लगाने की प्रति क्रिया में तो क्या दोनों लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? यह जरूर है की शिव और शिवा के पुत्र गणेश तभी तक नवनिर्माण-शुभकार्य करवा सकते हैं जब तक की उसे शिव शंकर सुमन रुद्रावतार हनुमान इस समाज को संभाल सकें अन्यथा हनुमान के एक दिरदेश पर कोई भी नवनिर्माण और शुभ कार्य गणेश संपादित नहीं करा सकते इस पर भी क्या हनुमान और दुर्वाशा आतंकवादी कहे जा सकते है? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोड़न के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।

क्या दोनों(दुर्वाशा ऋषि और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर) लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोनों के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।---------दुर्वाशा के सम्बन्ध में जब श्राप का जिक्र आता है तो कौसल साम्राज्य को जलाकर कर राख कर देने का प्रसंग कभी आता है और कभी यह कभी वह जलाकर रखा कर दूंगा और अनल(अग्नि) बाण जैसे वाक्य सामने आते हैं और यहां तक की उनको ही अग्नि का अवतार और महाकालेश्वर शिव का अवतार लोग कहते हैं और महामंगलेश्वर भी कहे जाते हैं श्राप और आशीर्वाद का विश्लेषण यदि किया जाय तो और हनुमान जी भी मंगलेश्वर ही हैं फिर भी लंका को ही जला दिए पूंछ में आग लगाने की प्रति क्रिया में तो क्या दोनों लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? यह जरूर है की शिव और शिवा के पुत्र गणेश तभी तक नवनिर्माण-शुभकार्य करवा सकते हैं जब तक की उसे शिव शंकर सुमन रुद्रावतार हनुमान इस समाज को संभाल सकें अन्यथा हनुमान के एक दिरदेश पर कोई भी नवनिर्माण और शुभ कार्य गणेश संपादित नहीं करा सकते इस पर भी क्या हनुमान और दुर्वाशा आतंकवादी कहे जा सकते है? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोड़न के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।

Thursday, July 17, 2014

जिस गौतम ऋषि को अपनी पत्नी की पवित्रा और दोष मुक्ति का ज्ञान भगवान श्री राम कराकर उनको मिलाये उसी सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय भगवान श्री राम को अपनी पत्नी माता सीता(माता लक्ष्मी) की पवित्रता और दोष मुक्ति का ज्ञान स्वयं कश्यप गोत्र के ही वरुण पुत्र गोत्रीय महर्षि वाल्मीकि तो न करा सके परन्तु प्रयागराज/तीर्थराजप्रयाग/अल्लाहाबाद स्थित सीतासमाहित स्थल सीतामढी में सीता के समाहित हो जाने के बाद भी बहुत दिन तक अयोध्या में शासन करते हुए भगवान श्रीराम को माता सीता की याद जब नहीं आयी तो उनको सती श्रेष्ठ सटी अनुसुईया और अत्रि के पुत्र दुर्वाशा/कृष्णात्रेय/अत्रि ऋषि के पुत्र दुर्वाशा(आर्यमगढ़:आजमगढ़ स्थित फूलपुर तहसील के सन्निकट स्थित दुर्वाशा आश्रम निवाशी दुर्वाशा) ने लक्ष्मण से भगवान श्रीराम से तत्काल मिलवाने की अपनी एक ही धमकी (अगर तुरंत नहीं मिलवाते हो तो पूरे विराट कौसल राज्य न की केवल अयोध्या को ही जलाकर समाप्त कर दूंगा) ने भगवान श्री राम को पुनः भाइयों समेत सरयू में समाहित करवाने का करक बन विष्णु लोग पहुंचकर माता सीता(लक्ष्मी) से पुनः मिलवा दिया। यह था दशरथ के चारों पुत्रों का अपनी प्रजा के प्रति प्रेम और ऋषि समाज का सम्मान की यह जानत हुए भी की स्वयं महाकालेश्वर शिव से वार्ता के दौरान अगर भगवान श्रीराम (बड़े भाई) के सामने गया तो मृत्यु निश्चित है उस पर भी ऋषि दुर्वाशा से मिलान करवाने को बाध्य हुए और इस प्रकार एक-एक कर हर भाई कौशल राज्य को दुर्वाशा ऋषि अपने टप से न जलाएं उसे बचाने के लिए सरयू में समाहित हुए। और यह भी की दुर्वाशा का श्राप और आशीर्वाद दोनों कल्याणकारी होता है अतः इस प्रकार विष्णु लोक जाकर भगवान श्रीराम अपने विष्णु स्वरुप में आ कर माता सीता जो लक्ष्मी स्वरुप में आ गयी थीं उनसे पुनः मिलते हैं और यह भी सुखद संयोग है जहां अयोध्या को वियोग वही सीता:लक्ष्मी से संयोग हुआ न दुर्वाशा का श्राप महा मंगल अतः दुर्वाशा महा मंगलेश्वर कहे गए हैं जहाँ हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनसुत/केसरी नंदन/मारुतीनंदन/आंजनेय/महाबीर बजरंग/शंकरसुमन मंगलेश्वर ही केवल हैं।

जिस गौतम ऋषि को अपनी पत्नी की पवित्रा और दोष मुक्ति का ज्ञान भगवान श्री राम कराकर उनको मिलाये उसी सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय भगवान श्री राम को अपनी पत्नी माता सीता(माता लक्ष्मी) की पवित्रता और दोष मुक्ति का ज्ञान स्वयं कश्यप गोत्र के ही वरुण पुत्र  गोत्रीय महर्षि  वाल्मीकि तो न करा सके परन्तु प्रयागराज/तीर्थराजप्रयाग/अल्लाहाबाद स्थित सीतासमाहित स्थल  सीतामढी में सीता के समाहित हो जाने के बाद भी बहुत दिन तक अयोध्या में शासन करते हुए भगवान श्रीराम को माता सीता की याद जब नहीं आयी तो उनको सती श्रेष्ठ सटी अनुसुईया और अत्रि के पुत्र दुर्वाशा/कृष्णात्रेय/अत्रि ऋषि के पुत्र दुर्वाशा(आर्यमगढ़:आजमगढ़ स्थित फूलपुर तहसील के सन्निकट स्थित दुर्वाशा आश्रम निवाशी दुर्वाशा) ने लक्ष्मण से भगवान श्रीराम से तत्काल मिलवाने की अपनी एक ही धमकी (अगर तुरंत नहीं मिलवाते हो तो पूरे विराट कौसल राज्य न की केवल अयोध्या को ही जलाकर समाप्त कर दूंगा) ने भगवान श्री राम को पुनः भाइयों समेत सरयू में समाहित करवाने का करक बन विष्णु लोग पहुंचकर माता सीता(लक्ष्मी) से पुनः मिलवा दिया। यह था दशरथ के चारों पुत्रों का अपनी प्रजा के प्रति प्रेम और ऋषि समाज का सम्मान की यह जानत हुए भी की स्वयं महाकालेश्वर शिव से वार्ता के दौरान अगर भगवान श्रीराम (बड़े भाई) के सामने गया तो मृत्यु निश्चित है उस पर भी ऋषि दुर्वाशा से मिलान करवाने को बाध्य हुए और इस प्रकार एक-एक कर हर भाई कौशल राज्य को दुर्वाशा ऋषि अपने टप से न जलाएं उसे बचाने के लिए सरयू में समाहित हुए। और यह भी की दुर्वाशा का श्राप और आशीर्वाद दोनों कल्याणकारी होता है अतः इस प्रकार विष्णु लोक जाकर भगवान श्रीराम अपने विष्णु स्वरुप में आ कर माता सीता जो लक्ष्मी स्वरुप में आ गयी थीं उनसे पुनः मिलते हैं और यह भी सुखद संयोग है जहां अयोध्या को वियोग वही सीता:लक्ष्मी से संयोग हुआ न दुर्वाशा का श्राप महा मंगल अतः दुर्वाशा महा मंगलेश्वर कहे गए हैं जहाँ हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनसुत/केसरी नंदन/मारुतीनंदन/आंजनेय/महाबीर बजरंग/शंकरसुमन मंगलेश्वर ही केवल हैं।