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Tuesday, November 25, 2014

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सम्मान पर जिन लोगों के एजेंट/अभिकर्तांओं ने को बट्टा लगाने का जाल बुनना सुरु किया था उनका उददेश्य पूर्ण होने से पूर्व उनकी शान पर सदा-सदा के लिए बट्टा लगा दिया गया 2001 में तो इसमे कोई गलत ही क्या है?(एक हिन्दू/मुस्लिम-दलित भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती से शादी इसलिए नहीं करता की वह धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य की सीमा के अंदर आ जाएगा और वह सबसे अधिक सरकारी सहायता प्राप्त समूह से हटाया जा सकेगा अपने को विवाह पूर्व सामाजिक/संवैधानिक/धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य मान लेगा तो। अगर किशी दलित ने भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती शादी किया तो निश्चित रूप से वह ईसाई-दलित है जो यह नौटंकी कर सकता है)।पंडित मदनमोहन(श्रीकृष्ण) मालवीय जी के गुरुकुल का कोई गिरिधर स्वयं में ही श्रीकृष्ण की ही सीमा में ही कैसे रह गया जब धर्म/जाती/कुल ही समान नहीं रहा वह तो शिव हो गया न सामाजिक कल्याण की ऐसी ऐसी परिस्थिति में।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सम्मान पर जिन लोगों के एजेंट/अभिकर्तांओं ने को बट्टा लगाने का जाल बुनना सुरु किया था उनका उददेश्य पूर्ण होने से पूर्व उनकी शान पर सदा-सदा के  लिए बट्टा लगा दिया गया 2001 में तो इसमे कोई गलत ही क्या है?(एक हिन्दू/मुस्लिम-दलित भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती से शादी इसलिए नहीं करता  की वह धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य की सीमा के अंदर आ जाएगा और वह सबसे अधिक सरकारी सहायता प्राप्त  समूह से हटाया जा सकेगा अपने को विवाह पूर्व सामाजिक/संवैधानिक/धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य मान लेगा तो। अगर किशी दलित ने भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती शादी किया तो निश्चित रूप से वह ईसाई-दलित है जो यह नौटंकी कर सकता है)।पंडित मदनमोहन(श्रीकृष्ण) मालवीय जी के गुरुकुल का कोई गिरिधर स्वयं में ही श्रीकृष्ण की ही सीमा में ही कैसे रह गया जब धर्म/जाती/कुल ही समान नहीं रहा वह तो शिव हो गया न सामाजिक कल्याण की ऐसी ऐसी परिस्थिति में।

ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -------------------------------मनु(कश्यप ऋषि का वह अवतार जो एक आम मानव के जैसे चरित्र का हो और जिसके उपरांत अन्य सभी 6 ऋषियों का भी मानवीय करन हुआ एक गोत्र के माध्यम से और इस प्रकार कुल 7 प्रारम्भिक गोत्र हुए: मनु स्मृति में क्या-क्या जुड़ा समयानुसार जिसमें हमें विकृति नजर आती हो पर मनुस्मृति ही गलत हो ऐसा हम नहीं कह सकते है क्योंकि मई स्वयं मानता हूँ की इस प्रयागराज में चाहे जिस भी जाती(ऊँच और नीच) या पंथ के लोग मेरे विरोधियों के वशीभूत हो अपने अल्प और तुछ्य स्वार्थ हेतु मुझे इस संसार का सबसे शूद्रतम, घृणित और अधःतम व्यक्ति ही शिध्ध करने का प्रयास ही नहीं किये वरन खानदानी और व्यक्तिगत रूप से भी पागल भी घोषित किये थे मेरे शब्दों में वे दुनिया के सबसे सबसे शूद्रतम व्यक्ति हैं और हकीकत यह है की उनकी आँखों पर पट्टी बंधी थे उर वे स्वयं पागल थे जिन्होंने ब्राह्मण की लड़की को ईसाई-दलित (वह व्यक्ति या परिवार जो सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को शादी पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य न मना लिया हो और इसका प्रमाण है की वह परिवार शादी बाद अपने सरकारी दस्तावेज में अपने पत्नी/पुत्रवधु विशेष के ही नाम के आगे ही विशेष रूप से उस सरकारी सहायता पावक वर्ग विशेष के सूचक नाम को जोड़वाता है और किशी अन्य पारिवारिक सदस्य के नाम के आगे वह वर्ग विशेस का सूचक नाम नहीं होता है सरकारी दस्तावेज में:---ऐसे व्यक्ति को लोग जातिवादी/धर्मवादी नहीं कहते हैं-------) का पाँव धोवाकर उनके घर भेजवा दिया (कोई और नहीं मिला था क्या आपको और आप की आप की कन्या को) जो भारतीय शास्त्रीय शादियों के नियम के विपरीत है और जिसमे पाँव धोने का प्रश्न ही नहीं आता है और यह एक प्रकार की नौटंकी है और इस शास्त्रीय नियम के अनुसार किशी ब्रह्मण कन्या के कन्या दान में ब्राह्मण माता-पिता का किशी वर का पाँव धोने की निम्नतम सीमा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही है। अतः समाज में शूद्र व्यक्तियों की कमी नहीं हर जाती और धर्म में से पर इसका मतलब यहाँ आर्य नहीं और यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कोई नहीं रह गया यह हो ही नहीं सकता। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -----ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।

ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।  ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -------------------------------मनु(कश्यप ऋषि का वह अवतार जो एक आम मानव के जैसे चरित्र का हो और जिसके उपरांत अन्य सभी 6 ऋषियों का भी मानवीय करन हुआ एक गोत्र के माध्यम से और इस प्रकार कुल 7 प्रारम्भिक गोत्र हुए: मनु स्मृति में क्या-क्या जुड़ा समयानुसार जिसमें हमें विकृति नजर आती हो पर मनुस्मृति ही गलत हो ऐसा हम नहीं कह सकते है क्योंकि मई स्वयं मानता हूँ की इस प्रयागराज में चाहे जिस भी जाती(ऊँच और नीच) या पंथ के लोग मेरे विरोधियों के वशीभूत हो अपने अल्प और तुछ्य स्वार्थ हेतु मुझे इस संसार का सबसे शूद्रतम, घृणित और अधःतम व्यक्ति ही शिध्ध करने का प्रयास ही नहीं किये वरन खानदानी और व्यक्तिगत रूप से भी पागल भी घोषित किये थे मेरे शब्दों में वे दुनिया के सबसे सबसे शूद्रतम व्यक्ति हैं और हकीकत यह है की उनकी आँखों पर पट्टी बंधी थे उर वे स्वयं पागल थे जिन्होंने ब्राह्मण की लड़की को ईसाई-दलित (वह व्यक्ति या परिवार जो सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को शादी पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य न मना लिया हो और इसका प्रमाण है की वह परिवार शादी बाद अपने सरकारी दस्तावेज में अपने पत्नी/पुत्रवधु विशेष के ही नाम के आगे ही विशेष रूप से उस सरकारी सहायता पावक वर्ग विशेष के सूचक नाम को जोड़वाता है और किशी अन्य पारिवारिक सदस्य के नाम के आगे वह वर्ग विशेस का सूचक नाम नहीं होता है सरकारी दस्तावेज में:---ऐसे व्यक्ति को लोग जातिवादी/धर्मवादी नहीं कहते हैं-------)  का पाँव धोवाकर उनके  घर भेजवा दिया (कोई और नहीं मिला था क्या आपको और आप की आप की कन्या को) जो भारतीय शास्त्रीय शादियों के नियम के विपरीत है और जिसमे पाँव धोने का प्रश्न ही नहीं आता है और यह एक प्रकार की नौटंकी है और इस शास्त्रीय नियम के अनुसार किशी ब्रह्मण कन्या के कन्या दान में ब्राह्मण माता-पिता का किशी वर का पाँव धोने की निम्नतम सीमा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही है। अतः समाज में शूद्र व्यक्तियों की कमी नहीं हर जाती और धर्म में से पर इसका मतलब यहाँ आर्य नहीं और यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कोई नहीं रह गया यह हो ही नहीं सकता। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -----ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।  ------Ek Hindu/Muslim-Dalit Bharateey Hindu Shastriy Vidhi/Riti se Shadi isee liye nahee kartaa ki vah dharmik roop se ek Brahman/Kshtriy/Vaisy ki semaa ke andar aa jaayegaa aur vah sarkari sahayataa rukane ke naate apane ko vivah poorv Brahman/Kshatriy/Vaisya manegaa nahee| 

आजमगढ़(महानतम व्यक्तियों का समूह स्थल:श्रेष्ठतम:आर्यमगढ़) का एक और एक ही गुरु हो सकता है और वह है मुझ रामपुर-223225:आज़मगढ़ के वे दान में मिले पाँचों गाँवों के बाबा सारंगधर/राकेशधर/शशिधर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर(बस्ती जनपद) और माता जी(जौनपुर) की संतानों का मातृ पक्ष, जौनपुर(जमदग्निपुर: नामित जमदग्नि/पुत्र भृगु/पिता-परशुराम/ कुल दधीचि/त्याग और ब्राह्मणत्व के प्रतीक)। मतलब आप समझ गए होंगे की महानतम व्यक्ति भी इस त्याग और ब्राह्मणत्व गुणवाले जमदग्नि ऋषि (जो गौ माता नंदिनी/कामधेनु की पुत्री की रक्षा में अपना प्राण त्यागे थे) की जमीन जौनपुर (जमदग्निपुर) के आगे नतमस्तक होते हैं।

आजमगढ़(महानतम व्यक्तियों का समूह स्थल:श्रेष्ठतम:आर्यमगढ़)  का एक और एक ही गुरु हो सकता है और वह है मुझ रामपुर-223225:आज़मगढ़ के वे दान में मिले पाँचों गाँवों के बाबा सारंगधर/राकेशधर/शशिधर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर(बस्ती जनपद) और माता जी(जौनपुर) की संतानों का मातृ पक्ष, जौनपुर(जमदग्निपुर: नामित जमदग्नि/पुत्र भृगु/पिता-परशुराम/ कुल दधीचि/त्याग और ब्राह्मणत्व के प्रतीक)। मतलब आप समझ गए होंगे की महानतम व्यक्ति भी इस त्याग और ब्राह्मणत्व गुणवाले जमदग्नि ऋषि (जो गौ माता नंदिनी/कामधेनु की पुत्री की रक्षा में अपना प्राण त्यागे थे) की जमीन जौनपुर (जमदग्निपुर) के आगे नतमस्तक होते हैं।  

शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में चरित्रहीन और विवाहपूर्ण कौमर्यभंगी और परनारिगामी नहीं हो सकते। यही है सती (पारवती) और शिव का प्रेम।



शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में चरित्रहीन और विवाहपूर्ण कौमर्यभंगी और परनारिगामी नहीं हो सकते। यही है सती (पारवती) और शिव का प्रेम।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। -

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। -

मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।



मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। ----------------------------------------------------------------मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। ----------------------------------------------------------------मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।