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Wednesday, March 4, 2015

हिंदी में रूचि रखने वालों के लिए चन्द्र/चंद/चाँद= चन्द्रमा/राकेश/शशि : जब संज्ञा (नाउन) के साथ चन्द्र/चंद शब्द का प्रयोग किया जाता है तो चन्द्र/चंद उस संज्ञा शब्द का आशय न बदलकर चन्द्र/चंद उसकी शोभा के लिए प्रयुक्त हुआ मान लिया जाता है जैसे की सुरेश चन्द्र , सतीश चन्द्र, राम चन्द्र, कृष्ण चन्द्र पर जब क्रिया(वर्ब) के साथ चन्द्र/चंद का प्रयोग किया जाता है तो उस स्थान पर चन्द्रमा के साथ उसके गुड और दोष के आधार पर उस पूरे शब्द का अर्थ लिया जाता है जैसे प्रेम(क्रिया)चंद/चन्द्र = चन्द्रमा से प्रेम करने वाला या चन्द्रमा का प्रेमी या चंद्रमा जिसे प्रिय हो मतलब सोमनाथ महादेव शंकर/काली मान जिनके लिए द्वितीया का चन्द्रमा सबसे प्यारा पुत्र है, कर्म(क्रिया) चंद मतलब चन्द्रमा के समान कर्म-गुड वाला, अविनाश(क्रिया) चन्द्र मतलब अविनाशी चन्द्रमा। तो मित्रों मै, प्रदीप (सूर्यकांत/सूर्य के भी प्रकाश का श्रोत/लक्ष्मीकांत/रामजानकी/सत्यनारायण) पुत्र कम से कम 1997 से 2014 तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चन्द्रमाँ/चन्द्रवंश को ही अपनी सेवा समर्पित करता रहा तब भी लोग न समझ पाये की मेरी ऊर्जा कहाँ लगी थी और सूर्य तथा चन्द्रमा में श्रेष्ठ कौन है? इस पर मुझ प्रदीप (सूर्यकांत/सूर्य के भी प्रकाश का श्रोत/लक्ष्मीकांत/रामजानकी/सत्यनारायण) को अपनी ऊर्जा और मेधा शक्ति प्रदर्शित करने का अवसर तलासना ही था इसे कुछ भी नाम दे दिया जाय? वैसे तो मै जन्म 11-11-1975 से ही किशी व्यक्ति विशेष की ऊर्जा का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष श्रोत रहा हूँ पर सीधा प्रभाव 1997 से पढ़ना प्रारम्भ हुआ जब किशी अंतर्राष्ट्रीय पटल पर किशी राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को मिली और जिसकी तहत जाहिर सी बात है सामाजिक ज्ञान रखने वालों के लिए की ऐसे में घर-परिवार-गाँव-सम्बन्धी तक के लोग परोक्ष रूप से प्रभावित किये जाते है। और वैसे भी ईस्वरीय विडम्बना है की कि किशी विशेष स्थापना के पुण्य कार्य में जो पाप होता है वह स्थापना कर्ता के सम्बन्धी और विशेष सम्बन्धी विशष रूप से भुगतते है और पुण्य भविष्य में उस स्थापना से सेवा में आने वाली राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक भुगतते है। --------------- क्योंकि मुझे चन्द्र/चंद/चन्द्रवंश की सेवा में बने रहने हेतु भारत देश की सीमा में ही बनाये रहने की आशा और वाह्य प्रयत्न ने मेरा नुक्सान किया है तो मै कम से कम इतना विश्वास दिलाता हूँ की कभी भी किशी भी धर्म/जाती/वंश के विरोध में कोई कार्य नहीं करूंगा और न भारत की सीमा के बहार अपना आवास बनाऊंगा पर देश द्रोही और समाज द्रोहियों के सुधार सम्बन्धी प्रक्रिया मन, वाणी, कर्म और अपनी लेखनी से भी जारी रखूंगा।



हिंदी में रूचि रखने वालों के लिए चन्द्र/चंद/चाँद= चन्द्रमा/राकेश/शशि : जब संज्ञा (नाउन) के साथ चन्द्र/चंद शब्द का प्रयोग किया जाता है तो चन्द्र/चंद उस संज्ञा शब्द का आशय न बदलकर चन्द्र/चंद उसकी शोभा के लिए प्रयुक्त हुआ मान लिया जाता है जैसे की सुरेश चन्द्र , सतीश चन्द्र, राम चन्द्र, कृष्ण चन्द्र पर जब क्रिया(वर्ब) के साथ चन्द्र/चंद का प्रयोग किया जाता है तो उस स्थान पर चन्द्रमा के साथ उसके गुड और दोष के आधार पर उस पूरे शब्द का अर्थ लिया जाता है जैसे प्रेम(क्रिया)चंद/चन्द्र = चन्द्रमा से प्रेम करने वाला या चन्द्रमा का प्रेमी या चंद्रमा जिसे प्रिय हो मतलब सोमनाथ महादेव शंकर/काली मान जिनके लिए द्वितीया का चन्द्रमा सबसे प्यारा पुत्र है, कर्म(क्रिया) चंद मतलब चन्द्रमा के समान कर्म-गुड वाला, अविनाश(क्रिया) चन्द्र मतलब अविनाशी चन्द्रमा। तो मित्रों मै, प्रदीप (सूर्यकांत/सूर्य के भी प्रकाश का श्रोत/लक्ष्मीकांत/रामजानकी/सत्यनारायण) पुत्र कम से कम 1997 से 2014 तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चन्द्रमाँ/चन्द्रवंश को ही अपनी सेवा समर्पित करता रहा तब भी लोग न समझ पाये की मेरी ऊर्जा कहाँ लगी थी और सूर्य तथा चन्द्रमा में श्रेष्ठ कौन है? इस पर मुझ प्रदीप (सूर्यकांत/सूर्य के भी प्रकाश का श्रोत/लक्ष्मीकांत/रामजानकी/सत्यनारायण) को अपनी ऊर्जा और मेधा शक्ति प्रदर्शित करने का अवसर तलासना ही था इसे कुछ भी नाम दे दिया जाय? वैसे तो मै जन्म 11-11-1975 से ही किशी व्यक्ति विशेष की ऊर्जा का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष श्रोत रहा हूँ पर सीधा प्रभाव 1997 से पढ़ना प्रारम्भ हुआ जब किशी अंतर्राष्ट्रीय पटल पर किशी राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को मिली और जिसकी तहत जाहिर सी बात है सामाजिक ज्ञान रखने वालों के लिए की ऐसे में घर-परिवार-गाँव-सम्बन्धी तक के लोग परोक्ष रूप से प्रभावित किये जाते है। और वैसे भी ईस्वरीय विडम्बना है की कि किशी विशेष स्थापना के पुण्य कार्य में जो पाप होता है वह स्थापना कर्ता के सम्बन्धी और विशेष सम्बन्धी विशष रूप से भुगतते है और पुण्य भविष्य में उस स्थापना से सेवा में आने वाली राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक भुगतते है। --------------- क्योंकि मुझे चन्द्र/चंद/चन्द्रवंश की सेवा में बने रहने हेतु भारत देश की सीमा में ही बनाये रहने की आशा और वाह्य प्रयत्न ने मेरा नुक्सान किया है तो मै कम से कम इतना विश्वास दिलाता हूँ की कभी भी किशी भी धर्म/जाती/वंश के विरोध में कोई कार्य नहीं करूंगा और न भारत की सीमा के बहार अपना आवास बनाऊंगा पर देश द्रोही और समाज द्रोहियों के सुधार सम्बन्धी प्रक्रिया मन, वाणी, कर्म और अपनी लेखनी से भी जारी रखूंगा।

Monday, March 2, 2015

वाराणसी/काशी रेल जंक्शन पर जिसने इसके भवन के अर्ध ऊपरी भाग और अर्ध गर्भगृह भाग निर्मित अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र को देखा होगा वह अवश्य समझ गया होगा की इस शिव की नगरी काशी//वाराणसी का अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र के प्रति क्या दायित्व है? मतलब जिस शिव के डमरू से समय(भूत, वर्तमान, भविष्य) समय का निर्धारण प्रारम्भ हुआ और जिसका निर्धारण करते है अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र के माध्यम से उस शिव/केदारेश्वर(आदिशंकर)/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ) की नगरी वाराणसी/काशी का क्या दायित्व है और उस शिव/केदारेश्वर(आदिशंकर)/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ) का क्या दायित्व है इस अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र और इसकी रक्षा के प्रति?

वाराणसी/काशी रेल जंक्शन पर जिसने  इसके भवन के अर्ध ऊपरी भाग और अर्ध गर्भगृह भाग निर्मित अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र को देखा होगा वह अवश्य समझ गया होगा की इस शिव की नगरी काशी//वाराणसी का  अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र के प्रति क्या दायित्व है? मतलब जिस शिव के डमरू से समय(भूत, वर्तमान, भविष्य) समय का निर्धारण प्रारम्भ हुआ और जिसका निर्धारण करते है अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र के माध्यम से उस शिव/केदारेश्वर(आदिशंकर)/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ) की नगरी वाराणसी/काशी का क्या दायित्व है और उस शिव/केदारेश्वर(आदिशंकर)/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ) का क्या दायित्व है इस अशोकचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र और इसकी रक्षा के प्रति?

Saturday, February 28, 2015

SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution but not for promoting the devils of the society. Real needy person should not miss used by the anti-national and anti-social elements but arrangement should be such that only these person should get entered in the process of getting support from the Union (from common people's fund of country/states).

SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution but not for promoting the devils of the society. Real needy person should not miss used by the anti-national and anti-social elements but arrangement should be such that only these person should get entered in the process of getting support from the Union (from common people's fund of country/states).

Friday, February 27, 2015

हिन्दू धर्म के अंदर और वाहर के वे लोग जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है उनके परिमार्जन के लिए भी और सभ्यतापूर्वक घर वापसी हेतु भी से मेरी कम से कम एक बात को पूरे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत स्वरुप से निर्मित धर्म/जाती के हिन्दू समाज को माननी ही पड़ेगी अगर उनको सशक्त रहना है तो जो संवैधानिक, सामाजिक और धार्मिक तीनो रूपों में सत्य है की "छल का विवाह भी भला है पर अगर क़ानून उसको मान्यता दे देता है और आप पर निर्भर है की आप अपनी उस संतान से जैसा चाहें व्यक्तिगत सम्बन्ध रखें" परन्तु अगर आप के सामने आप की कन्या का विवाह गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रित स्वरुप की जाती/धर्म से हिन्दू शास्त्रीय विधि से किया गया हो/ किया जा रहा हो पाँव पूजन विधि समेत जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है तो वह डकैती थी/ है जिसे आप अपनी कायरता से मान्यता दे रहे हैं पर कानूनन और धार्मिक रूप से वह वैध नहीं था/है।-------Note: The best marriage is in the same caste and religion and people should try his best for that.


हिन्दू धर्म के अंदर और वाहर के वे लोग जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक  तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है उनके परिमार्जन के लिए भी और सभ्यतापूर्वक घर वापसी हेतु भी से मेरी कम से कम एक बात को पूरे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत स्वरुप से निर्मित धर्म/जाती के हिन्दू समाज को माननी ही पड़ेगी अगर उनको सशक्त रहना है तो जो संवैधानिक, सामाजिक और धार्मिक तीनो रूपों में सत्य है की "छल का विवाह भी भला है पर अगर क़ानून उसको मान्यता दे देता है  और आप पर निर्भर है की आप अपनी उस संतान से जैसा चाहें व्यक्तिगत सम्बन्ध रखें"  परन्तु अगर आप के सामने आप की कन्या का विवाह गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रित स्वरुप की जाती/धर्म से हिन्दू शास्त्रीय विधि से किया गया हो/ किया जा रहा हो पाँव पूजन विधि समेत जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक  तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है तो वह डकैती थी/ है जिसे आप अपनी कायरता से मान्यता दे रहे हैं पर कानूनन और धार्मिक रूप से वह  वैध नहीं था/है।-------Note: The best marriage is in the same caste and religion and people should try his best for that.

''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" ।Rishi Bharadwaaj ((Student of Valmiki(Son of Varun and Grand Son of Rishi Kashyap) and Guru (Teacher ) of Rishi Garg)) was first person who given clean Chit to Dasharath (Incarnation of Rishi Kashyap) Nandan Lord Sri Ram in Prayagraj/Allahabad after Ravan Vadh and also send his pupil(Garga Gotriy Brahmana) to take part in Ashwamedh Yagya and its Bhoj. ---------Also Ravan's Killing by Shri Ram was arrangement here at Bharadwaaj Ashram by all Rishis and Brahma at Prayagraj/Allahabad when Shri Ram came here 1st time during his exile way from Ayodhya and where ever he went from here up to Lanka for kill Ravan was pre decided and was under control from here. “को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥“----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। सप्तर्षि प्रकृष्टा यज्ञ से यही ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि प्रकट हुए थे। मतलब सप्तर्षि प्रकृष्ठा यज्ञ ही सप्तर्षि का आगमन समय है जिसके बाद मानव सभ्यता का प्रारम्भ हुआ इस ऋषि सभ्यता की देख रेख में। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:"

''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" Rishi Bharadwaaj ((Student of Valmiki(Son of Varun and Grand Son of Rishi Kashyap) and Guru (Teacher ) of Rishi Garg)) was first person who given clean Chit to Dasharath (Incarnation of Rishi Kashyap) Nandan Lord Sri Ram in Prayagraj/Allahabad after Ravan Vadh and also send his pupil(Garga Gotriy Brahmana) to take part in Ashwamedh Yagya and its Bhoj. ---------Also Ravan's Killing by Shri Ram was arrangement here at Bharadwaaj Ashram by all Rishis and Brahma at Prayagraj/Allahabad when Shri Ram came here 1st time during his exile way from Ayodhya and where ever he went from here up to Lanka for kill Ravan was pre decided and was under control from here. “को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥“----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। सप्तर्षि प्रकृष्टा यज्ञ से यही ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि प्रकट हुए थे। मतलब सप्तर्षि प्रकृष्ठा यज्ञ ही सप्तर्षि का आगमन समय है जिसके बाद मानव सभ्यता का प्रारम्भ हुआ इस ऋषि सभ्यता की देख रेख में। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:"

Therefore Conclusion is:------- Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण



Therefore Conclusion is:------- Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण

जो गौतम (विष्णु/श्रीधर), कश्यप(शिव/प्रेमचंद), अंगारिसा(ब्रह्मा/जोशी) मिलकर विश्व हित के विशेष कार्यहेतु जिस पर विश्वाश किये हों तो वह तो सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म हो गया उससे भी वरिष्ठ कोई हुआ है इस ब्रह्माण्ड में?

जो गौतम (विष्णु/श्रीधर), कश्यप(शिव/प्रेमचंद), अंगारिसा(ब्रह्मा/जोशी) मिलकर विश्व हित के विशेष कार्यहेतु जिस पर विश्वाश किये हों तो वह तो सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म हो गया उससे भी वरिष्ठ कोई हुआ है इस ब्रह्माण्ड में?