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Wednesday, December 17, 2014

अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है। ---------जब कोई सनातन ब्राह्मण बने रहने की कीमत चुका दिया हो(त्याग की भी सीमा भी छोटी पड़ गयी हो जिसमे किशी द्वारा जिसकी मृत्यु तो संभव ही नहीं थी कम से कम 2057 (19657-2057=100) तक तो ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष और सम्पूर्ण मानव समाज को शूद्रता से बचाये रखने हेतु स्वयं शूद्रवत और अमानवीय कार्य के बदले दिए जाने वाले सामाजिक अपमान और तिरस्कार का घूँट भी विना किशी दोष के पीने हेतु तैयार होकर और नव निर्माण के साथ सृस्टि के सृजनात्मक कार्य को परिणति तक पहुंचाकर और श्रेष्ठतम समाज में स्थान बनाकर) और एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण के चरित्र और कर्त्तव्य निर्वहन किया हो प्रयागराज में रहते हुए भी और प्रयागराज के अलग किशी भी दशा और दिशा में तो वह किशी की दया का पात्र नहीं जो अपने को किशी विश्व महाशक्ति के डर वस एक ब्राह्मण होने पर गर्व महसूस न कर सके जिस युग में सनातन ब्राह्मण तो क्या एक ब्राह्मण का चरित्र निर्वहन ही दुर्लभ हो। वरन उसकी जो स्वयं की सामर्थ्य है वह तो विश्व महा शक्ति को ऋणातक बनाते हुए (विश्व महा शक्ति की शक्ति को समाप्त कर और मानवमूल्य के अनुपालन में पुनः उसका सृजन कर ) देने के वाद शेष बची है। अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है।



अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है। ---------जब कोई सनातन ब्राह्मण बने रहने की कीमत चुका दिया हो(त्याग की भी सीमा भी छोटी पड़ गयी हो जिसमे किशी द्वारा जिसकी मृत्यु तो संभव ही नहीं थी कम से कम 2057 (19657-2057=100) तक तो ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष और सम्पूर्ण मानव समाज को शूद्रता से बचाये रखने हेतु स्वयं शूद्रवत और अमानवीय कार्य के बदले दिए जाने वाले सामाजिक अपमान और तिरस्कार का घूँट भी विना किशी दोष के पीने हेतु तैयार होकर और नव निर्माण के साथ सृस्टि के सृजनात्मक कार्य को परिणति तक पहुंचाकर और श्रेष्ठतम समाज में स्थान बनाकर) और एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण के चरित्र और कर्त्तव्य निर्वहन किया हो प्रयागराज में रहते हुए भी और प्रयागराज के अलग किशी भी दशा और दिशा में तो वह किशी की दया का पात्र नहीं जो अपने को किशी विश्व महाशक्ति के डर वस एक ब्राह्मण होने पर गर्व महसूस न कर सके जिस युग में सनातन ब्राह्मण तो क्या एक ब्राह्मण का चरित्र निर्वहन ही दुर्लभ हो। वरन उसकी जो स्वयं की सामर्थ्य है वह तो विश्व महा शक्ति को ऋणातक बनाते हुए (विश्व महा शक्ति की शक्ति को समाप्त कर और मानवमूल्य के अनुपालन में पुनः उसका सृजन कर ) देने के वाद शेष बची है। अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है।

Thursday, December 11, 2014

A (AA:Comes from All Direction) + Nand (Sponteneous spiritual and devotional Joy) = Anand: - Act/Ability of availing Happiness(Spiritual and Devotional) sponteneously from all the possible direction


  • A (AA:Comes from All Direction) + Nand (Sponteneous spiritual and devotional Joy) = Anand: - Act/Ability Availing Happiness sponteneously from all the possible direction.

Wednesday, December 10, 2014

इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है:- दशरथ नंदन राम (श्रीराम) और जनक नंदिनी रामा(सीता) एक दूसरे के पूरक और प्रेरक हैं| अतः आप राम और रामा को अलग नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार रामा=श्री=लक्ष्मी और राम को एक साथ हम श्रीराम के रूप में पाते हैं और रामाराम ही श्रीराम हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है मतलब कुलदेवी महाकाली(महालक्ष्मी+महा सरस्वती+महागौरी:पारवती) वाले मेरे गाँव के प्रेरक और श्रद्धेय श्रीराम (रामाराम) ही है ।



इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है:- दशरथ नंदन राम (श्रीराम) और जनक नंदिनी रामा(सीता) एक दूसरे के पूरक और प्रेरक हैं| अतः आप राम और रामा को अलग नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार रामा=श्री=लक्ष्मी और राम को एक साथ हम श्रीराम के रूप में पाते हैं और रामाराम ही श्रीराम हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है मतलब कुलदेवी महाकाली(महालक्ष्मी+महा सरस्वती+महागौरी:पारवती) वाले मेरे गाँव के प्रेरक और श्रद्धेय श्रीराम (रामाराम) ही है ।


Tuesday, December 9, 2014

अगर किशी के आंका कोई कार्य देते हैं तो उनको पता होता है की अमुक कार्य मेरा कार्यवाहक या स्वयं सेवक कर लेगा परन्तु तीन-तीन आंका कार्यभार देते है और स्वयं उनको ही नहीं पता होता है की क्या इसका परिणाम होने वाला है अगर ज़रा सी भी सावधानी हटी और अनुशासन और संयम भांग हुआ परन्तु जिसको यह कार्य संपादित करना है वह स्वयं सेवक यह समझ रहा हो और इस कार्य की जिम्म्देदारी लेने से मना कर रहा हो तो समझ जाना चाहिए की यह स्वयं सेवक अपने तीनों आकाओं की सम्मिलित शक्ति है जो किशी एक से ज्यादा दूर की समझ और क्षमता रखता है यह अलग बात है की गुरु आज्ञा की मर्यादा उसे बाँध रखी थी और वह अपने अनुजों के हांथों की कठ पुतली बना रहा जिन अनुजों को ए बी सी डी भी इस आंतरिक और वाह्य परिवर्तन की न पता रही हो वरन वे तो केवल विषय और शोध क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और पद प्राप्ति की होड़ में ही लगे रहे हों। मुझ काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से आये स्वयं सेवक के लिए शायद प्रयागराज विश्वविद्यालय प्रांतीय विश्वविद्यालय था उस समय और आज भी प्रांतीय से केंद्रीय होने की देलही क्षमता प्राप्त करने की कोशिस भर कर रहा है जो संवैधानिक रूप से इसमे से एक आंका (ब्रह्मा: परमगुरु परमेश्वर) के अथक प्रयास से विगत एक दसक से केंद्रीय हो तो गया है।--------मै पुनः कहता हूँ की मेरी मेधा शक्ति का आंकलन अपने निम्न तरीके के कुटिल चाल से न किया जाय तो इस विश्व विद्यालय और स्वयं प्रयागराज के लिए अच्छा होगा। जिस प्रयागराज विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर राजेन्द्र गोविन्द हर्षे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय द्वारा ही आयोजित 2008 के पूरा छात्र सम्मिलन में दो-दो निमंत्रण पत्र भेजा था एक भारतीय विज्ञानं संस्थान बेंगलुरु के पोस्ट डॉक्टरेट छात्रावास पर और दूसरा वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के पते पर और दो बार फ़ोन भी किया गया था (948009010 और 08023600189) आने के सम्बन्ध में यात्रा विवरण और स्वयं आने के सम्बन्ध में जिसमे मैंने कहा था की क्या मेरे ताउजी प्रोफेसुर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय(परमपिता परमेश्वर) आ रहे हैं तो ऐसे में हाँ सुनाने के बाद मैंने कहा था की तब मुझे आने की जरूरत ही नहीं वे मेरे एक आंका ही समर्थ है उसको सफल बनाने में (वे दोनों निमंत्रण पत्र आज भी मेरे पास हैं)। ------कहने का मतलब यह है की अगर मेरा कार्यभार कोई ले सकता तो मै सब कुछ करने में समर्थ हूँ पर न तो ले सका और न तो ले पायेगा तो गलत आंकलन न किया जाय मेधा शक्ति का पिछला इतिहास और सार्वत्रिक प्रदर्शन भी देखा जाय क्योंकि विश्वविद्यालय सार्वभौमिक कला कौसल का जनक है। एक सनातन ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिरोध मैंने सहे प्रति स्पर्धा के रूप में वह किशी भी शिक्षण क्षेत्र में मिल सकता है पर इसे मै सार्वजनिक तो नहीं कर सकता पर सृस्टि के संरचनात्मक परिवर्तन हेतु सामूहिक कार्य हेतु नामित केंद्र में जो हुआ इस प्रांतीय विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्व विद्यालय बनने के दौरान इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में अगर उसे सार्वजनिक करूंगा तो गुरुकुल की मर्यादा भंग होगी और आप कह उठेंगे की वास्तव में प्रयागराज विश्वविद्यालय में सनातन ब्राह्मण की कमी हो गयी थी जो ऐसे शुभ लक्षण और प्राप्त सुअवसर को नहीं पहचान सके। वैसे भी ऐसा हजारों वर्षों में ही कभी-कभी ही शायद होता है इसी लिए इस धार्मिक कार्य को अपने प्रशासनिक कार्य शैली से दबाने का प्रयास मात्र करते रह गए और सब चीज पैर के नीचे से निकलती चली गयी और वह धार्मिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन बन सामने आ गया। अतः मुझे धन सम्पदा और कल-बल-छल से नीचा दिखने की कोशिस न की जाय पुनः अन्यथा इसका दुष्परिणाम ही पुनः सामने आएगा: तीसरे आंका तो स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री मामा, श्रीधर(विष्णु) मिश्रा जी ही है जिनके सानिध्य में मै सब कुछ शिखा था और अब उसका प्रयोग शेष है।

अगर किशी के आंका कोई कार्य देते हैं तो उनको पता होता है की अमुक कार्य मेरा कार्यवाहक या स्वयं सेवक कर लेगा परन्तु तीन-तीन आंका कार्यभार देते है और स्वयं उनको ही नहीं पता होता है की क्या इसका परिणाम होने वाला है अगर ज़रा सी भी सावधानी हटी और अनुशासन और संयम भांग हुआ परन्तु जिसको यह कार्य संपादित करना है वह स्वयं सेवक यह समझ रहा हो और इस कार्य की जिम्म्देदारी लेने से मना कर रहा हो तो समझ जाना चाहिए की यह स्वयं सेवक अपने तीनों आकाओं की सम्मिलित शक्ति है जो किशी एक से ज्यादा दूर की समझ और क्षमता रखता है यह अलग बात है की गुरु आज्ञा की मर्यादा उसे बाँध रखी थी और वह अपने अनुजों के हांथों की कठ पुतली बना रहा जिन अनुजों को ए बी सी डी भी इस आंतरिक और वाह्य परिवर्तन की न पता रही हो वरन वे तो केवल विषय और शोध क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और पद प्राप्ति की होड़ में ही लगे रहे हों। मुझ काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से आये स्वयं सेवक के लिए शायद प्रयागराज विश्वविद्यालय प्रांतीय विश्वविद्यालय था उस समय और आज भी प्रांतीय से केंद्रीय होने की देलही क्षमता प्राप्त करने की कोशिस भर कर रहा है जो संवैधानिक रूप से इसमे से एक आंका (ब्रह्मा: परमगुरु परमेश्वर) के अथक प्रयास से विगत एक दसक से केंद्रीय हो तो गया है।--------मै पुनः कहता हूँ की मेरी मेधा शक्ति का आंकलन अपने निम्न तरीके के कुटिल चाल से न किया जाय तो इस विश्व विद्यालय और स्वयं प्रयागराज के लिए अच्छा होगा। जिस प्रयागराज विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर राजेन्द्र गोविन्द हर्षे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय द्वारा ही आयोजित 2008 के पूरा छात्र सम्मिलन में दो-दो निमंत्रण पत्र भेजा था एक भारतीय विज्ञानं संस्थान बेंगलुरु के पोस्ट डॉक्टरेट छात्रावास पर और दूसरा वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के पते पर और दो बार फ़ोन भी किया गया था (948009010 और 08023600189) आने के सम्बन्ध में यात्रा विवरण और स्वयं आने के सम्बन्ध में जिसमे मैंने कहा था की क्या मेरे ताउजी प्रोफेसुर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय(परमपिता परमेश्वर) आ रहे हैं तो ऐसे में हाँ सुनाने के बाद मैंने कहा था की तब मुझे आने की जरूरत ही नहीं वे मेरे एक आंका ही समर्थ है उसको सफल बनाने में (वे दोनों निमंत्रण पत्र आज भी मेरे पास हैं)। ------कहने का मतलब यह है की अगर मेरा कार्यभार कोई ले सकता तो मै सब कुछ करने में समर्थ हूँ पर न तो ले सका और न तो ले पायेगा तो गलत आंकलन न किया जाय मेधा शक्ति का पिछला इतिहास और सार्वत्रिक प्रदर्शन भी देखा जाय क्योंकि विश्वविद्यालय सार्वभौमिक कला कौसल का जनक है। एक सनातन ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिरोध मैंने सहे प्रति स्पर्धा के रूप में वह किशी भी शिक्षण क्षेत्र में मिल सकता है पर इसे मै सार्वजनिक तो नहीं कर सकता पर सृस्टि के संरचनात्मक परिवर्तन हेतु सामूहिक कार्य हेतु नामित केंद्र में जो हुआ इस प्रांतीय विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्व विद्यालय बनने के दौरान इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में अगर उसे सार्वजनिक करूंगा तो गुरुकुल की मर्यादा भंग होगी और आप कह उठेंगे की वास्तव में प्रयागराज विश्वविद्यालय में सनातन ब्राह्मण की कमी हो गयी थी जो ऐसे शुभ लक्षण और प्राप्त सुअवसर को नहीं पहचान सके। वैसे भी ऐसा हजारों वर्षों में ही कभी-कभी ही शायद होता है इसी लिए इस धार्मिक कार्य को अपने प्रशासनिक कार्य शैली से दबाने का प्रयास मात्र करते रह गए और सब चीज पैर के नीचे से निकलती चली गयी और वह धार्मिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन बन सामने आ गया। अतः मुझे धन सम्पदा और कल-बल-छल से नीचा दिखने की कोशिस न की जाय पुनः अन्यथा इसका दुष्परिणाम ही पुनः सामने आएगा: तीसरे आंका तो स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री मामा, श्रीधर(विष्णु) मिश्रा जी ही है जिनके सानिध्य में मै सब कुछ शिखा था और अब उसका प्रयोग शेष है। Transfer of power in any institution does not mean transfer of Ordinance/law of the Institution: https://archive.today/aKXW
                     https://archive.today/7ocui

Friday, December 5, 2014

विवेक: क्रिया:अन्तःकरण की वह शक्ति जिसमें मनुष्य यह समझता हैं कि कौन सा काम अच्छा है या बुरा,अथवा करने योग्य है या नहीं; अच्छी बुद्धि या समझ।; क्रिया: सदविचार की योग्यता।; संज्ञा: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) तो ज्ञानेन्द्र या कहें तो ज्ञान का राजा कौन हुआ? मेरे विचार से निश्चित रूप से ज्ञानेन्द्र निहित अर्थ में विवेक: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) ही हुआ उसी तरह से जिस तरह से नरेंद्र का तात्पर्य नर का इंद्र या नर का राजा या नर श्रेष्ठ या श्रेष्ठ मानव होता है । विष्णु के सहस्रनाम(1000 नाम) हैं पर मूल नाम विष्णु ही उनके आप मानव के रूप में जन्म लिए सबसे बड़े भक्त ध्रुव के लिए सर्व श्रेष्ठ होता है, उसी तरह से ज्ञानेन्द्र, सत्यज्ञान, सुबोध, सिद्धार्थ और अन्य अनेको समानार्थक नाम का एक ही मुख्य केंद्रीय शब्द विवेक हुआ: विवेक, विद्या और ज्ञान का गहरा सम्बन्ध है देवी सरस्वती और ब्रह्मदेव से विशेषरूप जो इनको शिव:पारवती(सती) और विष्णु:लक्ष्मी से भी जोड़ता है क्योंकि ये सब विवेकवान और ज्ञानवान हैं और ये देवियाँ और देव त्रयम्बक:विवेक युक्त होए हैं जिसके शुभ और अशुभ दोनों से घिरे शिव को स्वयं त्रयम्बक:त्रिलोचन नाम ही दे दिया गया है जो इनका एक मात्र रक्षा कवच है। और इन त्रिदेवों तक ही नहीं सामान्य देवी-देवताओं और आम मानव का भी रक्षा कवच है उसका अपने अंदर निहित विवेक शक्ति।; धार्मिक व् सामाजिक संज्ञाकरण: त्रिनेत्र, त्रयम्बक, त्रिलोचन, राहुल, सिद्धार्थ, सुबोध।; अतः मेरे जिस गुरु ने मुझसे बचन लिया था नवंबर, 1999 में पंडित मदनमोहन(~श्रीकृष्ण) मालवीय जी के शैक्षिक प्रांगण(गुरुकुल) काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के विरला मंदिर में की कि तुम बचन दो कि जीवन में कभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाना वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुबोध(~विवेक) कांत(~कुमार) बोस ही थे अपने में ही विवेक कुमार थे और मै वही उनका पैर छूते हुए स्वीकारोक्ति दी थी अपने पूर्ण संज्ञान में उनके दिए हुए बचन को पालन करने का और वह दुनिया बदल जाने पर भी प्रतिबद्ध रहेगा।

विवेक:
क्रिया:अन्तःकरण की वह शक्ति जिसमें मनुष्य यह समझता हैं कि कौन सा काम अच्छा है या बुरा,अथवा करने योग्य है या नहीं; अच्छी बुद्धि या समझ।;
क्रिया: सदविचार की योग्यता।;
संज्ञा: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ)
तो ज्ञानेन्द्र या कहें तो ज्ञान का राजा कौन हुआ? मेरे विचार से निश्चित रूप से ज्ञानेन्द्र निहित अर्थ में विवेक: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) ही हुआ उसी तरह से जिस तरह से नरेंद्र का तात्पर्य नर का इंद्र या नर का राजा या नर श्रेष्ठ या श्रेष्ठ मानव होता है । विष्णु के सहस्रनाम(1000 नाम) हैं पर मूल नाम विष्णु ही उनके आप मानव के रूप में जन्म लिए सबसे बड़े भक्त ध्रुव के लिए सर्व श्रेष्ठ होता है, उसी तरह से ज्ञानेन्द्र, सत्यज्ञान, सुबोध, सिद्धार्थ और अन्य अनेको समानार्थक नाम का एक ही मुख्य केंद्रीय शब्द विवेक हुआ: विवेक, विद्या और ज्ञान का गहरा सम्बन्ध है देवी सरस्वती और ब्रह्मदेव से विशेषरूप जो इनको शिव:पारवती(सती) और विष्णु:लक्ष्मी से भी जोड़ता है क्योंकि ये सब विवेकवान और ज्ञानवान हैं और ये देवियाँ और देव त्रयम्बक:विवेक युक्त होए हैं जिसके शुभ और अशुभ दोनों से घिरे शिव को स्वयं त्रयम्बक:त्रिलोचन नाम ही दे दिया गया है जो इनका एक मात्र रक्षा कवच है। और इन त्रिदेवों तक ही नहीं सामान्य देवी-देवताओं और आम मानव का भी रक्षा कवच है उसका अपने अंदर निहित विवेक शक्ति।;
धार्मिक व् सामाजिक संज्ञाकरण: त्रिनेत्र, त्रयम्बक, त्रिलोचन, राहुल, सिद्धार्थ, सुबोध।;
अतः मेरे जिस गुरु ने मुझसे बचन लिया था नवंबर, 1999 में पंडित मदनमोहन(~श्रीकृष्ण) मालवीय जी के शैक्षिक प्रांगण(गुरुकुल) काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के विरला मंदिर में की कि तुम बचन दो कि जीवन में कभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाना वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुबोध(~विवेक) कांत(~कुमार) बोस ही थे अपने में ही विवेक कुमार थे और मै वही उनका पैर छूते हुए स्वीकारोक्ति दी थी अपने पूर्ण संज्ञान में उनके दिए हुए बचन को पालन करने का और वह दुनिया बदल जाने पर भी प्रतिबद्ध रहेगा।

Wednesday, December 3, 2014

I introduced by word Hi! 5 through e-mails many times from different English mail IDs. for last few months of this year. PANDEY? Pandey:Composition of five chief elements i.e. composition of Fire. Air, Water, Soil, Space i.e. have combined characteristics of all five chief elements of the nature. In the Indian continents: Pandey is A Representative of five chief element of the human community: Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Muslims//Shri-Ramaism & Christian//Shri-Krishnaism too i.e. whole Sanatan Hindus.>>>>>> My Grand Father Bachan Ram Pandey was closed friend of George Fernandes for reference: Article of my village Ramapur on wikipedia.

I introduced by word Hi! 5 through e-mails many times from different English mail IDs. for last few months of this year. PANDEY? Pandey:Composition of five chief elements i.e. composition of Fire. Air, Water, Soil, Space i.e. have combined characteristics of all five chief elements of the nature. In the Indian continents: Pandey is A Representative of five chief element of the human community: Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Muslims//Shri-Ramaism & Christian//Shri-Krishnaism too i.e. whole Sanatan Hindus.
>>>>>> My Grand Father Bachan Ram Pandey was closed friend of George Fernandes for reference: http://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur

Friday, November 28, 2014

विजय विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा-------यह मेरे नर्सरी(शून्य कक्षा) से स्नातक तक के गुरु श्रद्धेय स्वर्गीय श्री भानु प्रताप मिश्रा को समर्पित है। I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power).

विजय विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा-------यह मेरे नर्सरी(शून्य कक्षा) से स्नातक तक के गुरु श्रद्धेय स्वर्गीय श्री भानु प्रताप मिश्रा को समर्पित है।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसाने वाला
प्रेम-सुधा बरसाने वाला
वीरों को हरसाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 1।
लाल रंग बजरंगबली का
हरा अहल इस्लाम अली का
श्वेत सभी धर्मों का टीका
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 2।
है चरखे का चित्र सँवारा
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा
हरे रंग का संकट सारा
है यह सच्चा भाव हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 3।
स्वतन्त्रता के भीषण रण में
लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में
काँपे शत्रु देखकर मन में
मिट जाये भय संकट सारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 4।
इस झण्डे के नीचे निर्भय
लें स्वराज्य हम अविचल निश्चय
बोलो भारत माता की जय
स्वतन्त्रता हो ध्येय हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 5।
आओ प्यारे वीरो आओ
देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 6।
शान न इसकी जाने पाये
चाहें जान भले ही जाये
विश्व विजय कर के दिखलायें
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 7।
I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power).