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Saturday, February 6, 2016

अल्लाहाबाद/अल्लाह-आबाद/इला-आबाद/इला-आवास/प्रयागराज/इलाहाबाद में जो उन कुर्मावतारियों जो भस्मासुर और रावण/अहिरावण के लिए कार्य करते हैं उनसे हार मान ले वह ब्राह्मण, ब्राह्मण है और जो हार न माने वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहार/ब्रह्मक्षत्रिय/ब्राह्मण-क्षत्रिय/क्षत्रिय ब्राह्मण है तो अब ज्यादा दिन यह परिभासा नहीं चलने वाली है|

अल्लाहाबाद/अल्लाह-आबाद/इला-आबाद/इला-आवास/प्रयागराज/इलाहाबाद में जो उन कुर्मावतारियों जो भस्मासुर और रावण/अहिरावण के लिए कार्य करते हैं उनसे हार मान ले वह ब्राह्मण, ब्राह्मण है और जो हार न माने वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहार/ब्रह्मक्षत्रिय/ब्राह्मण-क्षत्रिय/क्षत्रिय ब्राह्मण है तो अब ज्यादा दिन यह परिभासा नहीं चलने वाली है|>>>>जिस तरह से सप्तर्षि के से एक ब्रह्मर्षि विश्वामित्र/विश्वरथ/कौसिक में क्षत्रिय गुण होने के नाते कौसिक गोत्रियों को लोग क्षत्रिय मान लेते है उसी तरह से सत्य के लिए 14-15 वर्ष तक संघर्ष करने के की क्षमता वह भी प्रयागराज के रहकर करने वाले मुझ विवेक(सरस्वती का मानस पुत्र) /त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव (वाह्य सांसारिक नाम)/ गिरिधारी/श्रीकृष्ण/कुर्मावतारी विष्णु/धरणीधर:शेषनाग/11 वाँ शिवावतार हनुमान:अम्बवादेकर (राशिगत नाम जो वास्तविक शक्ति स्रोत है) को लोग क्षत्रिय समझने लगे तो मैं पूंछता हूँ की क्या परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म की शक्ति के एक अंश शक्ति के स्वामी, शिव क्या क्षत्रिय कहे जाएंगे या परमब्रह्म के एक अंश कहे जाएंगे जो किशी के लिए भी शक्ति के स्रोत हों? उसी तरह से जो केवल शिव ही नहीं रहा वरन तीन अवस्थाओं को प्राप्त कर चुका हो वह राम या कृष्ण क्या कायस्थ/राजस्व ब्राह्मण कहा जाएगा? और जो विष्णु का गुण रखता हो, वैभव का श्रोत हो तो क्या वह वैश्य कहा जाएगा? या जो ज्ञान का परम श्रोत हो वह ब्राह्मण कहा जाएगा? यह तो भ्रम की स्थिति है और इस भ्रम में जीने वाला कभी सत्य आचरण कर नहीं सकता और न ही सत्यनारायण/श्रीधर/श्रीकांत/रामजानकी/प्रदीप/आदित्यनाथ//सूर्यकान्त/सूर्यनाथ/लक्ष्मीनारायण कहवा सकता है इस सत्य को जारी रखने के लिए कई भासाओं के ज्ञान की भी जरूरत नहीं वरन शिव मतलब शक्ति और ज्ञान की जरूरत पड़ती है। वह इन तीनों गुणों से पूर्ण शक्तियों के मिलन से संभव है और तीनों गुणों से पूर्ण शक्तिया राम और कृष्ण में थीं और इस लिए वे सशरीर परमब्रह्म कहलाये जिसमे से एक शक्ति का अभाव था परशुराम में और वे इसी लिए सशरीर परमब्रह्म नही कहलाये और न तो सत्यनारायण? तो उनका अनुसरण ब्रह्मक्षत्रिय/भूमिहार/क्षत्रिय-ब्राह्मण करते हैं लेकिन क्या ब्राह्मण समाज भी ऐसा करेगा और क्या तीनो गुण एक साथ होने के नाते राम और कृष्ण क्षत्रिय नहीं कहे जाएंगे? तो भाई सत्याग्रह करने वाला रामानंद मिश्रा और देवव्रत पाण्डेय का कुल अगर ब्राह्मण नहीं तो फिर उस दो गाँव में कोई ब्राह्मण नहीं और फिर इस संसार में कोई ब्राह्मण नहीं और यह संसार और उसका अस्तित्व नहीं और इस प्रकार हम सभी का अस्तित्व नहीं तो फिर क्या हैं हम? यह पूरा संसार एक तैरती हुई प्रेत आत्मा है जो केवल अनुभव कर रहा की हम सशरीर जिन्दा हैं?>>>>>>>>>>>>मैंने 14-15 वर्ष में अपने लिए निर्धारित सब कार्य पूर्ण किया श्रिष्टि के इतिहास में जितनी भी विभूतियाँ जन्म ली होंगी सबका आचरण एक-एक कर करते हुए किया हूँ और अब सबके सम्मिलित आचरण के अनुसार व्यवहार कर रहा हूँ लेकिन मेरा श्राप है ऐसे ब्राह्मण समाज को जो मति भ्रम, निहित स्वार्थ, बेईमानी से पूर्ण हो और ईर्ष्यावश मेरे साथ अमानवीय व्यवहार किया कुर्मावतारियों का साथ लेकर की तुम कुर्मावतारियों से जिंदगीभर दबे रहोगे और जब तुमको मेरी याद आएगी और मेरी शरण में आओगे तभी पुनः तुम्हे मुक्ति मिलेगी जैसे आज तुम मेरे 14-15 वर्ष के प्रयास से उनसे मुक्त हुए हो। उस पाताल लोक में जाकर और वहां अन्तरचछु से झांककर देखिये जहाँ का नाम सुनकर तुम अपनी देवियों को भस्मासुर और रावण को भी परोस देते हो तुम्हारी बुद्धि भ्रस्ट हो जाती है धातु और कागज़ की लक्ष्मी/पारवती/सरस्वती के लिए और असली लक्ष्मी/सरस्वती/पारवती का भान और मान तथा शिव, राम और कृष्ण की भी पहचान करने की शक्ति भी नहीं रही आप में।>>>>>>>मै सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण हूँ और कश्यप गोत्रीय होने के नाते परशुराम को ब्राह्मण रक्षा का बचन देने वाले कश्यप ऋषि के बचनो का पालन करना हमारा परम कर्तव्य है और इस हेतु गाय, गंगा, गायत्री(स्त्री समाज) और ब्राह्मण रक्षा हमारा धर्म है और अगर हम ब्राह्मण रक्षा करते हैं तो ब्राह्मण धर्म और इस प्रकार सम्पूर्ण मानव समाज की रक्षा करेगा पर मेरी भी रक्षा होगी तभी यह संभव होगा और अगर वही ब्राह्मण समाज कालिदास की तरह वही दाल काटेगा जिस पर बैठा है और मति भ्रम, निहित स्वार्थ, बेईमानी से पूर्ण हो और ईर्ष्यावश मेरी रक्षा करने वाले सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, रामानंद कुल/परिवारसे आने वाले मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्री श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय सारंगधर/चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/शशांकशेखर/----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म) कुल से आने वाले, डॉ प्रेमचंद(शिव) पर या उनके लिए निर्धारित लक्ष्य पर ही वार करने लगे तो या स्वयं लगातार मुझपर ही वार करने लगे तो फिर देवीकुल का नाश ही होना था और वह हुआ भी पर नाश को कम किया जाय और पूर्व स्थिति बहाल की जाय उसके लिए मुझ विवेक/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव को ही 2001-2003 में दांव पर लगा दिया था उसी ब्राह्मण समाज ने जिस ब्राह्मण समाज ने स्वयं गलती की थी।>>>>> मैंने 14-15 वर्ष में अपने लिए निर्धारित सब कार्य पूर्ण किया श्रिष्टि के इतिहास में जितनी भी विभूतियाँ जन्म ली होंगी सबका आचरण एक-एक कर करते हुए किया हूँ और अब सबके सम्मिलित आचरण के अनुसार व्यवहार कर रहा हूँ लेकिन मेरा श्राप है ऐसे ब्राह्मण समाज को जो मति भ्रम, निहित स्वार्थ, बेईमानी से पूर्ण हो और ईर्ष्यावश मेरे साथ अमानवीय व्यवहार किया कुर्मावतारियों का साथ लेकर की तुम कुर्मावतारियों से जिंदगीभर दबे रहोगे और जब तुमको मेरी याद आएगी और मेरी शरण में आओगे तभी पुनः तुम्हे मुक्ति मिलेगी जैसे आज तुम मेरे 14-15 वर्ष के प्रयास से उनसे मुक्त हुए हो। उस पाताल लोक में जाकर और वहां अन्तरचछु से झांककर देखिये जहाँ का नाम सुनकर तुम अपनी देवियों को भस्मासुर और रावण को भी परोस देते हो तुम्हारी बुद्धि भ्रस्ट हो जाती है धातु और कागज़ की लक्ष्मी/पारवती/सरस्वती के लिए और असली लक्ष्मी/सरस्वती/पारवती का भान और मान तथा शिव, राम और कृष्ण की भी पहचान करने की शक्ति भी नहीं रही आप में।>>>>>>>>>>जिस तरह से सप्तर्षि के से एक ब्रह्मर्षि विश्वामित्र/विश्वरथ/कौसिक में क्षत्रिय गुण होने के नाते कौसिक गोत्रियों को लोग क्षत्रिय मान लेते है उसी तरह से सत्य के लिए 14-15 वर्ष तक संघर्ष करने के की क्षमता वह भी प्रयागराज के रहकर करने वाले मुझ विवेक(सरस्वती का मानस पुत्र) /त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव (वाह्य सांसारिक नाम)/ गिरिधारी/श्रीकृष्ण/कुर्मावतारी विष्णु/धरणीधर:शेषनाग/11 वाँ शिवावतार हनुमान:अम्बवादेकर (राशिगत नाम जो वास्तविक शक्ति स्रोत है) को लोग क्षत्रिय समझने लगे तो मैं पूंछता हूँ की क्या परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म की शक्ति के एक अंश शक्ति के स्वामी, शिव क्या क्षत्रिय कहे जाएंगे या परमब्रह्म के एक अंश कहे जाएंगे जो किशी के लिए भी शक्ति के स्रोत हों? उसी तरह से जो केवल शिव ही नहीं रहा वरन तीन अवस्थाओं को प्राप्त कर चुका हो वह राम या कृष्ण क्या कायस्थ/राजस्व ब्राह्मण कहा जाएगा? और जो विष्णु का गुण रखता हो, वैभव का श्रोत हो तो क्या वह वैश्य कहा जाएगा? या जो ज्ञान का परम श्रोत हो वह ब्राह्मण कहा जाएगा? यह तो भ्रम की स्थिति है और इस भ्रम में जीने वाला कभी सत्य आचरण कर नहीं सकता और न ही सत्यनारायण/श्रीधर/श्रीकांत/रामजानकी/प्रदीप/आदित्यनाथ//सूर्यकान्त/सूर्यनाथ/लक्ष्मीनारायण कहवा सकता है इस सत्य को जारी रखने के लिए कई भासाओं के ज्ञान की भी जरूरत नहीं वरन शिव मतलब शक्ति और ज्ञान की जरूरत पड़ती है। वह इन तीनों गुणों से पूर्ण शक्तियों के मिलन से संभव है और तीनों गुणों से पूर्ण शक्तिया राम और कृष्ण में थीं और इस लिए वे सशरीर परमब्रह्म कहलाये जिसमे से एक शक्ति का अभाव था परशुराम में और वे इसी लिए सशरीर परमब्रह्म नही कहलाये और न तो सत्यनारायण? तो उनका अनुसरण ब्रह्मक्षत्रिय/भूमिहार/क्षत्रिय-ब्राह्मण करते हैं लेकिन साथ-साथ वे राम और कृष्ण को भी मानते हैं लेकिन क्या ब्राह्मण समाज भी ऐसा करेगा और क्या तीनो गुण एक साथ होने के नाते राम और कृष्ण क्षत्रिय नहीं कहे जाएंगे? तो भाई सत्याग्रह करने वाला रामानंद मिश्रा और देवव्रत पाण्डेय का कुल अगर ब्राह्मण नहीं तो फिर उस दो गाँव में कोई ब्राह्मण नहीं और फिर इस संसार में कोई ब्राह्मण नहीं और यह संसार और उसका अस्तित्व नहीं और इस प्रकार हम सभी का अस्तित्व नहीं तो फिर क्या हैं हम? यह पूरा संसार एक तैरती हुई प्रेत आत्मा है जो केवल अनुभव कर रहा की हम सशरीर जिन्दा हैं?>>>>>अल्लाहाबाद/अल्लाह-आबाद/इला-आबाद/इला-आवास/प्रयागराज/इलाहाबाद में जो उन कुर्मावतारियों जो भस्मासुर और रावण/अहिरावण के लिए कार्य करते हैं उनसे हार मान ले वह ब्राह्मण, ब्राह्मण और जो हार न माने वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहार/ब्रह्मक्षत्रिय/ब्राह्मण-क्षत्रिय/क्षत्रिय ब्राह्मण है तो अब ज्यादा दिन यह परिभासा नहीं चलने वाली है|

Friday, February 5, 2016

नयी सहस्राब्दी के लिए संक्रमण काल की अवस्था में काशी की भूमि पर विद्यमान अविनाश चतुर्वेदी, पुरुषोत्तम सिंह, विवेक कुमार पाण्डेय, विष्णुप्रताप सिंह, विनय शंकर पाण्डेय जैसे पञ्च प्यारों की ऊर्जा के आसवन से उपजी ऊर्जा की कशौटी पर प्रयागराज/मानवता के स्रोत सप्तर्षि के प्राकट्य हेतु मानव इतिहास के प्राचीनतम यज्ञ, प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान/अल्लाहबाद/इलाहाबाद/अल्लाह-आवास/ईला-आबाद/इला-आवास/त्रिवेणी/त्रिसंगम/त्रिआब(दोआब के नाम की सर्वव्यापकता भले है) की भूमि से जो दो सर्वमान्य नाम है जो है वह अविनाश चन्द्र पाण्डेय और विवेक कुमार पाण्डेय है| दो(पांच) में इतनी ऊर्जा है की सम्पूर्ण सचर और अचर को ऊर्जा देते रहे और जिनमे सम्पूर्ण मानव संतति को पतित को पावन बना देने की क्षमता है तो केवल देवियों को पतित से पावन बनाने में ही क्या कुछ कमी रह जाएगी तो लीजिये सभी देवियाँ पावन हो चुकी हैं।

नयी सहस्राब्दी के लिए संक्रमण काल की अवस्था में काशी की भूमि पर विद्यमान अविनाश चतुर्वेदी, पुरुषोत्तम सिंह, विवेक कुमार पाण्डेय, विष्णुप्रताप सिंह, विनय शंकर पाण्डेय जैसे पञ्च प्यारों की ऊर्जा के आसवन से उपजी ऊर्जा की कशौटी पर प्रयागराज/मानवता के स्रोत सप्तर्षि के प्राकट्य हेतु मानव इतिहास के प्राचीनतम यज्ञ, प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान/अल्लाहबाद/इलाहाबाद/अल्लाह-आवास/ईला-आबाद/इला-आवास/त्रिवेणी/त्रिसंगम/त्रिआब(दोआब के नाम की सर्वव्यापकता भले है) की भूमि से जो दो सर्वमान्य नाम है जो है वह अविनाश चन्द्र पाण्डेय और विवेक कुमार पाण्डेय है| दो(पांच) में इतनी ऊर्जा है की सम्पूर्ण सचर और अचर को ऊर्जा देते रहे और जिनमे सम्पूर्ण मानव संतति को पतित को पावन बना देने की क्षमता है तो केवल देवियों को पतित से पावन बनाने में ही क्या कुछ कमी रह जाएगी तो लीजिये सभी देवियाँ पावन हो चुकी हैं।  

प्रयागराज/सप्तर्षियों के प्राकट्य हेतु मानवता के इतिहास का प्राचीनतम यज्ञ का स्थान/इलाहाबाद/अल्लाह-आबाद/अलाहाबाद/इला-आवास/इला-आबाद में मेरा विकल्प खोजा जा रहा है तो मेरा विकल्प केवल मेरे गुरु रहे मेरे सगोत्रीय बड़े भैया/प्रथम दृष्टया अलौकिक जीजा ही हो सकते है अगर समान पारिस्थितिक जीवन हो सकता है तो फिर उनके सहयोगियों को कैसे रेखांकित करने का दम भरा जा रहा है जो कदम-कदम पर गिरते और थमते रहते है मतलब जिनका शक्ति श्रोत वे स्वयं नहीं हैं? Note: सूर्यवंश: सूर्यपुत्री जमुना श्रीकृष्ण (चन्द्रवंश) की पटरानी थी।

 प्रयागराज/सप्तर्षियों के प्राकट्य हेतु मानवता के इतिहास का प्राचीनतम यज्ञ का स्थान/इलाहाबाद/अल्लाह-आबाद/अलाहाबाद/इला-आवास/इला-आबाद में मेरा विकल्प खोजा जा रहा है तो मेरा विकल्प केवल मेरे गुरु रहे मेरे सगोत्रीय बड़े भैया/प्रथम दृष्टया अलौकिक जीजा ही हो सकते है अगर समान पारिस्थितिक जीवन हो सकता है तो फिर उनके सहयोगियों को कैसे रेखांकित करने का दम भरा जा रहा है जो कदम-कदम पर गिरते और थमते रहते है मतलब जिनका शक्ति श्रोत वे स्वयं नहीं हैं? Note: सूर्यवंश: सूर्यपुत्री जमुना श्रीकृष्ण (चन्द्रवंश) की पटरानी थी।

वह समय जब सब देवियाँ और उनके मातहत गलती कर गए नारायणन के भतीजे और अपराध शास्त्र के विशेसज्ञ सिम्हाद्री=नरसिंघ (जिनको विवेक(आतंरिक रूप से गिरिधर) के कार्य में अपराध दिखाई दिया और वे अपनी क्षमता का मर्यादाहीन उपयोग उसे छति पहुंचाने में किये किशी दबाव वश भी हो सकता है ) और उनके साथ ही साथ दलित ईसाइयत या उनके अभिकर्ताओं की कुटिल, कुत्सित और सांस्कृतिक रूप से अमर्यादित चाल के आगे पश्त होकर और देवियों का रक्षक गिरिधारी ही दोषी सिद्ध कर दिया गया दुनियावालों द्वारा उन देवियों को साक्ष्य मान और तब यह दुनिया ही बदल गयी और ऐसे में वह विवेक(सरस्वती का मानस पुत्र) /त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव (वाह्य सांसारिक नाम)/ गिरिधारी/श्रीकृष्ण/कुर्मावतारी विष्णु/धरणीधर:शेषनाग/11 वाँ शिवावतार हनुमान:अम्बवादेकर (राशिगत नाम जो वास्तविक शक्ति स्रोत है) केवल विष्णु ही नहीं रहा वरन गिरिधर के सभी शाब्दिक अर्थों से निहित निकाय की सम्मिलित शक्ति और गुणों का अनुसरण करते हुए तीनो मूल शक्तियों की वह सम्मिलित शक्ति हो परमब्रह्म=ब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) मतलब शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/श्रीराम/राम पद प्राप्त कर लिया जिससे स्त्री=प्रकृति:शक्ति और पुरुष:आत्मा दोनों की उत्पत्ति होती है। तो उसको चुनौती न दिया जाय किशी द्वारा जब न ब्रह्मा, न विष्णु, और न शिव की ही पूर्ण अवस्था की जरूरत रह गयी| परमब्रह्म:ब्रह्म द्वारा पूर्ण परिवर्तन कर 14 वर्ष में पूर्ववत स्थिति बहाल कर दी गयी और अब जब केवल व्यवहारिक ब्रह्मा, विष्णु और महेश की ही आवश्यकता रह गयी है तो तेजी क्यों दिखाई जा रही है और उस परमब्रह्म:ब्रह्म की परिक्षा क्यों ली जा रही है? देवियाँ स्वयं हार जाने के बाद जब उसका लग्न उसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीधर(विष्णु) के द्वारा अवध क्षेत्र से तय करने जा रहे थे (और जहां ही आगे हुआ भी), तो देवियों की ही एक विशेष समूह ने भारतीय विज्ञान संस्थान में 2007 दिसंबर में कहा था की यहां जो भी आप को संगत रूप से रुचिकर लगे उससे ही हम लोग आप का लग्न करा देंगे केवल हम लोगों को आप की सहमति चाहिए। उसने कहाँ की प्रयोग बहुत हुआ और अब मेरी लग्न किससे हो उसके लिए मामा का निर्णय सिरोधार्य होगा तो फिर उसके कौन सी परिक्षा बाकी है जो तीनो एक साथ बन चुका है और देविओं और मातृभूमि की रक्षा के बचन के पालन की उसकी कौन सी परिक्षा बची है । गुरुदेवों और मातृ-पिता के बचन की रक्षा का पालन भी तो शेष नहीं रहा? वह तो स्वयं अपने पुरुषार्थ से उन हारी हुई देवियों को भी सफल घोषित करते हुए अपने लिए निर्धारित कार्य में उनको भी अपना अप्रतिम सहयोगी मान लिया है। पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इस्लाम और ईसाइयत पर कोई समझौता कभी नहीं कर सकता हूँ जैसे की त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की एकल अवस्था को सामान्यतः सामान्य जग जीवन के लिए तीन अंश ब्रह्मा, विष्णु और महेश में बने रहने को प्रेरित करता हूँ एक ही परमब्रह्म=ब्रह्म का अंश होने के बावजूद।

वह समय जब सब देवियाँ और उनके मातहत गलती कर गए नारायणन के भतीजे और अपराध शास्त्र के विशेसज्ञ सिम्हाद्री=नरसिंघ (जिनको विवेक(आतंरिक रूप से गिरिधर) के कार्य में अपराध दिखाई दिया और वे अपनी क्षमता का मर्यादाहीन उपयोग उसे छति पहुंचाने में किये किशी दबाव वश भी हो सकता है ) और उनके साथ ही साथ दलित ईसाइयत या उनके अभिकर्ताओं की कुटिल, कुत्सित और सांस्कृतिक रूप से अमर्यादित चाल के आगे पश्त होकर और देवियों का रक्षक गिरिधारी ही दोषी सिद्ध कर दिया गया दुनियावालों द्वारा उन देवियों को साक्ष्य मान और तब यह दुनिया ही बदल गयी और ऐसे में वह विवेक(सरस्वती का मानस पुत्र) /त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव (वाह्य सांसारिक नाम)/ गिरिधारी/श्रीकृष्ण/कुर्मावतारी विष्णु/धरणीधर:शेषनाग/11 वाँ शिवावतार हनुमान:अम्बवादेकर (राशिगत नाम जो वास्तविक शक्ति स्रोत है) केवल विष्णु ही नहीं रहा वरन गिरिधर के सभी शाब्दिक अर्थों से निहित निकाय की सम्मिलित शक्ति और गुणों का अनुसरण करते हुए तीनो मूल शक्तियों की वह सम्मिलित शक्ति हो परमब्रह्म=ब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) मतलब शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/श्रीराम/राम पद प्राप्त कर लिया जिससे स्त्री=प्रकृति:शक्ति और पुरुष:आत्मा दोनों की उत्पत्ति होती है। तो उसको चुनौती न दिया जाय किशी द्वारा जब न ब्रह्मा, न विष्णु, और न शिव की ही पूर्ण अवस्था की जरूरत रह गयी| परमब्रह्म:ब्रह्म द्वारा पूर्ण परिवर्तन कर 14 वर्ष में पूर्ववत स्थिति बहाल कर दी गयी और अब जब केवल व्यवहारिक ब्रह्मा, विष्णु और महेश की ही आवश्यकता रह गयी है तो तेजी क्यों दिखाई जा रही है और उस परमब्रह्म:ब्रह्म की परिक्षा क्यों ली जा रही है? देवियाँ स्वयं हार जाने के बाद जब उसका लग्न उसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीधर(विष्णु) के द्वारा अवध क्षेत्र से तय करने जा रहे थे (और जहां ही आगे हुआ भी), तो देवियों की ही एक विशेष समूह ने भारतीय विज्ञान संस्थान में 2007 दिसंबर में कहा था की यहां जो भी आप को संगत रूप से रुचिकर लगे उससे ही हम लोग आप का लग्न करा देंगे केवल हम लोगों को आप की सहमति चाहिए। उसने कहाँ की प्रयोग बहुत हुआ और अब मेरी लग्न किससे हो उसके लिए मामा का निर्णय सिरोधार्य होगा तो फिर उसके कौन सी परिक्षा बाकी है जो तीनो एक साथ बन चुका है और देविओं और मातृभूमि की रक्षा के बचन के पालन की उसकी कौन सी परिक्षा बची है । गुरुदेवों और मातृ-पिता के बचन की रक्षा का पालन भी तो शेष नहीं रहा? वह तो स्वयं अपने पुरुषार्थ से उन हारी हुई देवियों को भी सफल घोषित करते हुए अपने लिए निर्धारित कार्य में उनको भी अपना अप्रतिम सहयोगी मान लिया है। पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इस्लाम और ईसाइयत पर कोई समझौता कभी नहीं कर सकता हूँ जैसे की त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की एकल अवस्था को सामान्यतः सामान्य जग जीवन के लिए तीन अंश ब्रह्मा, विष्णु और महेश में बने रहने को प्रेरित करता हूँ एक ही परमब्रह्म=ब्रह्म का अंश होने के बावजूद।

सज्जनस्य हृदयं नवनीतं यद्वदन्ति कवयस्तदलीकम् । अन्यदेहविलसत्परितापात् सज्जनो द्रवति, नो नवनीतम् ॥ संत ह्रदय नवनीत समाना, कहई कविंह पर कहई न जाना। स्व परिताप द्रवहिं नवनीते, पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ (Poets say that the heart of a good man is like butter, but that is not correct. The heat (frustration/sorrow/ etc.) residing in another body does not melt butter, but it does melt the good man.)

सज्जनस्य हृदयं नवनीतं यद्वदन्ति कवयस्तदलीकम् ।  अन्यदेहविलसत्परितापात् सज्जनो द्रवति, नो नवनीतम् ॥
संत ह्रदय नवनीत समाना, कहई कविंह पर कहई न जाना। 
स्व परिताप द्रवहिं नवनीते, पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ 
(Poets say that the heart of a good man is like butter, but that is not correct. The heat (frustration/sorrow/ etc.) residing in another body does not melt butter, but it does melt the good man.)

पिनाक फणि बालेन्दु भस्म मन्दाकिनी युता ।प वर्ग रचिता मूर्तिः अपवर्ग प्रडास्तु नः ॥((Equipped with a spear(pinaka), snake(phani), the crescent of the moon(balendu), ashes and the ganga, may this idol composed from the 'pa varga' (the consonants pa, pha, ba, bha, ma|पिनाक फणि बालेन्दु भस्म मन्दाकिनी ) lead us to heaven (apavarga).)

पिनाक फणि बालेन्दु भस्म मन्दाकिनी युता ।प वर्ग रचिता मूर्तिः अपवर्ग प्रडास्तु नः ॥((Equipped with a spear(pinaka), snake(phani), the crescent of the moon(balendu), ashes and the ganga, may this idol composed from the 'pa varga' (the consonants pa, pha, ba, bha, ma|पिनाक फणि बालेन्दु भस्म मन्दाकिनी ) lead us to heaven (apavarga).)

स्वयं महेशः शव्शुरो नगेशः सखा धनेशश्च सुतो गणेशः । तथापि भिक्षाटनमेव शम्भोः बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा ॥ (Himself the great lord, his father in law the king of mountains, his friend the king of wealth and his son is the lord of the ganas(all the gods). even then roaming around begging for food is shiva's destiny only god's wish is.)

स्वयं महेशः शव्शुरो नगेशः सखा धनेशश्च सुतो गणेशः । तथापि भिक्षाटनमेव शम्भोः बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा ॥ (Himself the great lord, his father in law the king of mountains, his friend the king of wealth and his son is the lord of the ganas(all the gods). even then roaming around begging for food is shiva's destiny only god's wish is.)